Lok Sabha Expansion
Lok Sabha Expansion : भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे में एक युगांतकारी परिवर्तन की आहट सुनाई दे रही है। केंद्र सरकार लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। इस महत्वाकांक्षी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार ने रूपरेखा तैयार कर ली है। प्रस्तावित बदलावों के तहत, नई लोकसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व काफी बढ़ जाएगा। कुल 850 सीटों में से 815 सीटें विभिन्न राज्यों के खाते में जाएंगी, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें सुरक्षित की गई हैं। इस विस्तार का मुख्य उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप जन-प्रतिनिधित्व को अधिक प्रभावी और सुलभ बनाना है।
इस ऐतिहासिक बदलाव को वैधानिक रूप देने के लिए सरकार ने 16 अप्रैल से 18 अप्रैल 2026 तक संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र आहूत किया है। इस सत्र के दौरान तीन अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए जाएंगे: संविधान (131वां संशोधन) बिल, परिसीमन विधेयक (संशोधन) बिल और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल। सरकार ने इन विधेयकों के मसौदे (Drafts) सभी सांसदों को पहले ही भेज दिए हैं ताकि सत्र के दौरान व्यापक चर्चा हो सके। यह सत्र न केवल सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इसमें बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण बिल पर भी निर्णायक चर्चा होने की संभावना है, जो भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल सकता है।
सीटों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) के लिए सबसे बड़ा पेंच जनसंख्या के आंकड़ों को लेकर था। सरकार ने इस बार ‘जनसंख्या’ की परिभाषा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव का प्रस्ताव रखा है। नए ड्राफ्ट के अनुसार, सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए 2011 की जनगणना के डेटा को आधार बनाया जाएगा। यह प्रावधान संसद को यह विवेकाधीन शक्ति प्रदान करेगा कि वह सीटों के आवंटन के लिए किस समयवधि के डेटा को सबसे सटीक मानती है। 2011 के आंकड़ों को आधार मानने से उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच सीटों के संतुलन को लेकर चल रही बहसों को एक नया मोड़ मिल सकता है।
सरकार की योजना इन सभी क्रांतिकारी बदलावों को 2029 के आगामी आम चुनावों से लागू करने की है। नए संसद भवन के निर्माण के समय ही भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बैठने की क्षमता बढ़ाई गई थी, जो अब इस विस्तार योजना के साथ सार्थक होती दिख रही है। यदि ये बिल पारित हो जाते हैं, तो 2029 का चुनाव भारत के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा चुनाव होगा, जहाँ अधिक सांसद जनता की आवाज बनेंगे। हालांकि, सीटों के इस नए गणित को लेकर राजनीतिक गलियारों में विरोध के स्वर भी फूटने लगे हैं। विपक्षी दलों का मानना है कि इससे क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ सकता है।
जैसे ही सीटों के विस्तार की खबरें सार्वजनिक हुईं, राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। कई क्षेत्रीय दलों और दक्षिण भारतीय राज्यों ने इस पर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है, उन्हें कम सीटें मिलने का डर है, जबकि अधिक आबादी वाले राज्यों का प्रभाव संसद में बहुत बढ़ जाएगा। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस क्षेत्रीय असंतुलन की आशंका को दूर करना और सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लेकर इस संवैधानिक संशोधन को पारित कराना है। आगामी विशेष सत्र न केवल सरकार की विधायी क्षमता की परीक्षा होगा, बल्कि यह भारत के भविष्य के राजनीतिक मानचित्र की नींव भी रखेगा।
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