Lucknow Fire Tragedy: बायोमेट्रिक लॉक और एक गेट से बनी मौत का कुआं इमारत

Lucknow Fire Tragedy:  उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में भड़की भीषण आग ने 15 मासूम छात्रों की जान ले ली। दम घुटने और आग की लपटों से घिरे इन बच्चों की अंतिम चीखें पूरे देश के अंतर्मन को झकझोर गई हैं। यह हादसा कुछ समय पहले दिल्ली के मालवीय नगर में एक गेस्ट हाउस में हुए अग्निकांड की याद दिलाता है, जिसमें 23 लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी। यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि ये घटनाएं आकस्मिक या प्राकृतिक आपदाएं नहीं हैं, बल्कि इन्हें सीधे तौर पर ‘प्रशासनिक और संस्थागत हत्या’ कहा जाना चाहिए। चंद रुपयों के व्यावसायिक लाभ के लिए इंसानी जिंदगियों का सौदा खुलेआम किया जा रहा है और व्यवस्था तमाशबीन बनी बैठी है।

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हादसों का तय ढर्रा: मीडिया की सुर्खियां और गहरी नींद में सोती व्यवस्था

हर बड़े हादसे के बाद हमारे सिस्टम का एक तयशुदा ढर्रा होता है। तत्काल प्रभाव से जांच कमेटियों का गठन, मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे की घोषणाएं और दिखावे के लिए कुछ दिनों तक चलने वाला सीलिंग अभियान। लेकिन जैसे ही मीडिया की सुर्खियां बदलती हैं, व्यवस्था दोबारा गहरी नींद में सो जाती है। आज संकरी गलियों में संचालित हो रहे कोचिंग संस्थान, बिना उचित वेंटिलेशन के बेसमेंट में चल रही लाइब्रेरी और मानकों को ताक पर रखकर बनाए गए गेस्ट हाउस देश के युवाओं के लिए शिक्षा या आश्रय के केंद्र नहीं, बल्कि ‘डेथ ट्रैप’ (मौत का जाल) बन चुके हैं। जवाबदेही तय करने के बजाय सिर्फ कागजी खानापूर्ति करना अब इस सिस्टम की फितरत बन गई है।

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यूपी अग्नि निवारण गाइडलाइन 2005: नियम सख्त, धरातल पर नदारद

उत्तर प्रदेश में रिहायशी और व्यावसायिक इमारतों को आग के खतरों से सुरक्षित रखने के लिए ‘यूपी अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा गाइडलाइन 2005’ एक अत्यंत विस्तृत और व्यापक कानून है। इसके प्रावधान इतने सशक्त हैं कि यदि इनका महज 50 प्रतिशत भी ईमानदारी से पालन करा लिया जाए, तो ऐसे भीषण हादसों को पूरी तरह रोका जा सकता है। दुर्भाग्य यह है कि यह कानून कागजों की फाइलों में तो बहुत मजबूत है, लेकिन जमीन पर पूरी तरह नदारद है। कानून के उल्लंघन और भ्रष्टाचार की मिलीभगत ने इसे सिर्फ एक औपचारिकता बना दिया है।

15 मीटर का नियम और अनिवार्य फायर एनओसी (Fire NOC)

अधिनियम के नियम 3(1) के तहत, 15 मीटर से अधिक ऊंचाई (सामान्यतः 4-5 मंजिला) वाली सभी श्रेणियों की इमारतों पर यह कानून कड़ाई से लागू होता है। ऐसी प्रत्येक इमारत के संचालक के लिए मुख्य अग्निशमन अधिकारी (CFO) से ‘फायर क्लीयरेंस’ और अंतिम ‘Fire NOC’ प्राप्त करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इस प्रमाण पत्र के बिना कोचिंग या गेस्ट हाउस का संचालन अवैध है। नेशनल बिल्डिंग कोड ऑफ इंडिया (NBC) के अनुसार, शैक्षणिक और व्यावसायिक इमारतों में फायर ब्रिगेड के लिए पर्याप्त खुली जगह (फायर लेन) होनी चाहिए ताकि राहत कार्य में कोई बाधा न आए। अक्सर देखा जाता है कि संकरी गलियों में दमकल गाड़ियां पहुंच ही नहीं पातीं, जिससे मामूली आग भी भयावह रूप ले लेती है।

निकासी मार्ग और जीवन-रक्षक सुरक्षा प्रणालियां

किसी भी आपातकालीन स्थिति में सुरक्षित और त्वरित निकासी के लिए इमारत में कम से कम दो चौड़ी और धुआं-मुक्त सीढ़ियां होनी चाहिए। कानून के मुताबिक, सर्पिलाकार (Spiral) सीढ़ियां पूरी तरह प्रतिबंधित हैं, क्योंकि भगदड़ के समय इन पर नियंत्रण पाना असंभव होता है। पानी की कमी न हो, इसके लिए अंडरग्राउंड और ओवरहेड टैंक का आरक्षित होना जरूरी है, जो केवल आग बुझाने के उपयोग में आएं। इसके अलावा, हर मंजिल पर सक्रिय ‘वेट राइजर’ और होज रील होनी चाहिए ताकि आग के शुरुआती 10 मिनटों में ही उस पर काबू पाया जा सके। अधिकांश हादसों में मौतें आग से नहीं, बल्कि धुआं भरने और रास्ता न मिलने से होती हैं।

अलार्म प्रणाली और चमकते एग्जिट साइन: अनदेखी का शिकार

अक्सर कोचिंग सेंटरों में आधुनिक स्मोक डिटेक्टर्स और हीट डिटेक्टर्स नदारद होते हैं। सेंसर लगे होने पर वे धुएं का पता लगते ही हूटर बजा देते, जिससे बच्चों को संभलने का समय मिल जाता। साथ ही, केंद्रीय पब्लिक एड्रेस सिस्टम और लाउडस्पीकर की कमी के कारण भगदड़ मच जाती है। सबसे बड़ी लापरवाही यह है कि अंधेरे और जहरीले धुएं के बीच रास्ता दिखाने वाले ‘EXIT’ साइन बोर्ड भी नहीं होते। कानून के अनुसार, इन बोर्ड्स को इनबिल्ट बैटरी वाला होना चाहिए ताकि बिजली कटने पर भी वे रास्ता दिखा सकें। इन छोटी-छोटी चीजों की अनदेखी ही बड़े हादसों को न्योता देती है।

ट्रेनिंग और ऑडिट: केवल कागजी औपचारिकता

अधिनियम के तहत कोचिंग संस्थानों के स्टाफ को अग्निशमन उपकरणों की व्यावहारिक ट्रेनिंग देना और नियमित ‘मॉक ड्रिल’ कराना अनिवार्य है। लेकिन सच्चाई यह है कि अधिकांश स्थानों पर न तो कोई ड्रिल होती है और न ही स्टाफ को यह पता होता है कि आग बुझाने का सिलेंडर कैसे काम करता है। इसके अलावा, फायर एनओसी कोई आजीवन प्रमाणपत्र नहीं है; समय-समय पर उपकरणों की कार्यक्षमता की जांच और एनओसी का नवीनीकरण कराना कानूनी अनिवार्यता है। भ्रष्ट तंत्र ने इसे भी ‘सुविधा शुल्क’ से जोड़ दिया है, जहां बिना निरीक्षण के फाइलों पर हस्ताक्षर हो जाते हैं।

भ्रष्टाचार और लालच: मौत का कॉकटेल

हादसों का गहन विश्लेषण करने पर एक कड़वी हकीकत सामने आती है—बिल्डिंग मालिक और फायर विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की साठगांठ। उपकरणों की जांच केवल फाइलों में होती है। व्यावसायिक लालच के कारण छोटे क्लासरूम में क्षमता से कहीं अधिक छात्र बैठाए जाते हैं, और कमरों को प्लाईवुड के पार्टीशन से विभाजित कर दिया जाता है, जो आग लगने पर ईंधन (Fuel) का काम करते हैं। अधिकांश इमारतों में प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही रास्ता होता है, जो शॉर्ट-सर्किट होने पर सीधे मौत का दरवाजा बन जाता है।

ठोस कार्रवाई की जरूरत: अब नहीं चलेगा दिखावा

लखनऊ का अग्निकांड सिस्टम की पूर्ण नाकामी है। जब तक मुनाफे को इंसानी जान से ऊपर रखा जाएगा, ऐसी त्रासदियां समाज को झकझोरती रहेंगी। समय आ गया है कि सरकारें केवल नोटिस जारी करने की औपचारिकता से आगे बढ़ें। बिना फायर सेफ्टी वाले संस्थानों को तत्काल पूरी तरह सील किया जाए। नियमों का उल्लंघन करने वाले मालिकों के साथ-साथ एनओसी जारी करने वाले भ्रष्ट अधिकारियों पर भी गैर-इरादतन हत्या (धारा 304) के तहत सीधे आपराधिक मुकदमे दर्ज होने चाहिए। समाज और अभिभावकों को भी जागरूक होना होगा। अपने बच्चों को सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी हमारी सामूहिक है, ताकि शिक्षा के ये केंद्र फिर कभी मासूमों के लिए ‘मरणघर’ न बनें।

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Chandan Das

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