Magh Mela 2026
Magh Mela 2026: प्रयागराज की पावन धरती पर आयोजित माघ मेले में इन दिनों श्रद्धा और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। कड़ाके की ठंड के बीच संगम की रेती पर साधु-संतों के विभिन्न स्वरूप श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन इस बार सबसे अधिक चर्चा 6 वर्षीय ‘बाल राम’ श्रीश बाहुबली महाराज की हो रही है। श्रृंगवेरपुर धाम से आए नन्हे श्रीश महाराज साक्षात भगवान राम के बाल स्वरूप में दर्शन दे रहे हैं। उनकी मासूमियत और चेहरे का ओज देखकर संगम आने वाले श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हैं। वे केवल वेशभूषा में ही नहीं, बल्कि अपने ज्ञान और आचरण से भी लोगों को अचंभित कर रहे हैं।
मात्र छह वर्ष की कोमल आयु में श्रीश बाहुबली महाराज भगवद्गीता के कठिन श्लोकों का इतनी शुद्धता और प्रवाह के साथ उच्चारण करते हैं कि बड़े-बड़े विद्वान भी दंग रह जाते हैं। उनका कहना है कि उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म का प्रचार करना और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों के प्रति जागरूक करना है। संगम तट पर वे प्रतिदिन मां गंगा की आरती और पूजन करते हैं। बच्चों को संदेश देते हुए वे कहते हैं कि संस्कार ही जीवन की असली पूंजी है, इसलिए हर बच्चे को अपने माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए और गुरुओं का हृदय से सम्मान करना चाहिए।
माघ मेले की व्यवस्थाओं से प्रभावित होकर नन्हे श्रीश महाराज ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इस बार माघ मेले में महाकुंभ जैसी भव्य सुविधाएं दी गई हैं, जिससे साधु-संतों और कल्पवासियों को काफी सहूलियत हो रही है। गौरतलब है कि श्रीश महाराज अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान भी सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने रामलला के बाल रूप में भक्तों को दर्शन दिए थे। वे कई बार सार्वजनिक मंचों पर सीएम योगी के समक्ष ‘शिव तांडव स्तोत्र’ का पाठ कर चुके हैं, जिसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है।
हाल ही में जब संत प्रेमानंद महाराज को लेकर कुछ विवादित टिप्पणियां सामने आई थीं, तब 6 वर्षीय श्रीश बाहुबली महाराज उनके समर्थन में मजबूती से खड़े हुए थे। उन्होंने बड़े ही तार्किक ढंग से कहा था कि प्रेमानंद महाराज राधा नाम की अटूट शक्ति के कारण ही जीवित हैं। श्रीश का मानना है कि ईश्वरीय कृपा से नाम जप के बल पर असाध्य रोगों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। उनकी इस परिपक्व सोच और निर्भीक वाणी ने उन्हें सोशल मीडिया और आध्यात्मिक जगत में एक विशेष पहचान दिलाई है।
श्रीश महाराज जिस श्रृंगवेरपुर धाम से आते हैं, उसका रामायण काल में विशेष महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा दशरथ ने यहीं पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न कराया था। यह निषादराज की नगरी है, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने राजसी वस्त्रों का त्याग कर वनवासी रूप धारण किया था। यहीं से केवट ने उन्हें गंगा पार कराई थी। इसी महान भूमि के संस्कारों को लेकर श्रीश महाराज आज संगम की रेती पर ‘विश्व गुरु भारत’ का सपना संजोए हुए हैं। उनका मानना है कि आने वाले समय में पूरी दुनिया में सनातन धर्म का मान-सम्मान और अधिक बढ़ेगा।
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