TMC Split : पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय जबरदस्त भूचाल आया हुआ है। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) इतिहास के सबसे बड़े संकट और आंतरिक बगावत से गुजर रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा है और उनके हाथ से पार्टी की कमान छूटने का खतरा मंडरा रहा है। दावे के मुताबिक, पार्टी के 58 विधायक और 20 सांसद बागी हो चुके हैं, जबकि 100 से अधिक पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है। इस पूरे विद्रोह का नेतृत्व ऋतब्रत बनर्जी और सांसद काकोली घोष कर रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या बागी गुट कानूनी रूप से ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाकर पार्टी से बेदखल कर सकता है?

बागी गुट का गणित: संसद से लेकर विधानसभा तक हलचल
तृणमूल कांग्रेस के भीतर बगावत की रूपरेखा काफी बड़ी नजर आ रही है। बागी विधायक दल की कमान ऋतब्रत बनर्जी के हाथों में है, जिन्हें संदीपान साहा, जावेद अहमद खान, शिउली साहा और अखरुज्जैन समेत 58 विधायकों का समर्थन हासिल है। इस गुट ने ऋतब्रत को अपना नेता चुनकर विधानसभा अध्यक्ष से मंजूरी भी ले ली है।

दूसरी ओर, संसद में काकोली घोष के नेतृत्व में 20 सांसदों के बागी होने का दावा किया जा रहा है। इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है और एनडीए (NDA) में शामिल होने की इच्छा जताई है।
सांसदों की सूची और ममता के वफादार
बागी गुट द्वारा 20 सांसदों का दावा किए जाने के बावजूद, फिलहाल 14 सांसदों के नाम ही मुख्य रूप से सामने आए हैं। इनमें शताब्दी रॉय, बापी हलदर, अरूप चक्रवर्ती, जून मालिया, दीपक अधिकारी (देव), कालीपदा सरेन, जगदीश बसुनिया, असित मल, अबू ताहिर खान, खलीकुर रहमान, शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी और पार्थ भौमिक शामिल हैं।
इस बगावत के बाद भी ममता बनर्जी के साथ पार्टी के कई दिग्गज नेता मुस्तैदी से खड़े हैं। ममता के वफादार खेमे में अभिषेक बनर्जी, सायनी घोष, कीर्ति आजाद, महुआ मोइत्रा, सौगत रॉय, सुदीप बंद्योपाध्याय और कल्याण बनर्जी जैसे बड़े नाम शामिल हैं, जो पार्टी संगठन को बचाए रखने में जुटे हैं।
क्या ममता बनर्जी को निष्कासित करना संभव है?
संवैधानिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, ममता बनर्जी को उनकी ही बनाई पार्टी ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ से बाहर करना लगभग असंभव है। भले ही बागी गुट असली TMC होने का दावा कर रहा हो और पार्टी का नाम व सिंबल छीनने की कोशिश में हो, लेकिन संगठन और राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर आज भी ममता बनर्जी का पूर्ण नियंत्रण है। जब तक बागी गुट विधायी दल के साथ-साथ संगठन और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अपना पूर्ण बहुमत साबित नहीं कर देता, तब तक ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाना या निष्कासित करना कानूनी रूप से मुमकिन नहीं है।
बागी गुट को कैसे साबित करना होगा बहुमत?
यदि बागी गुट को ममता बनर्जी को बेदखल करके पार्टी पर कब्जा करना है, तो उन्हें कई कड़े कानूनी चरणों से गुजरना होगा:
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दो-तिहाई बहुमत: दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत अपनी सदस्यता बचाने के लिए बागी गुट को विधानसभा और संसद में दो-तिहाई बहुमत साबित करना होगा।
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संविधान में संशोधन: बागी गुट को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की आपातकालीन बैठक बुलानी होगी।
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अविश्वास प्रस्ताव: बैठक में पार्टी का आंतरिक संविधान बदलकर ममता बनर्जी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करना होगा। इसके बाद ही सर्वसम्मति से किसी नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव किया जा सकता है।
इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग की भूमिका
यदि मामला आगे बढ़ता है, तो असली और नकली TMC का फैसला चुनाव आयोग (EC) की दहलीज पर होगा। चुनाव आयोग ‘इलेक्शन सिंबल्स (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के तहत पूरे मामले की गहन जांच करेगा।
आयोग मुख्य रूप से तीन बिंदुओं को देखेगा: पार्टी का आंतरिक संविधान क्या कहता है, विधायी दल (सांसद और विधायक) का बहुमत किसके पास है, और पार्टी की राष्ट्रीय व राज्य कार्यकारिणी में किसका पलड़ा भारी है। यदि बागी गुट इन सभी मोर्चों पर अपना निर्विवाद बहुमत साबित करने में सफल रहता है, तभी चुनाव आयोग पार्टी का नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न बागी गुट को सौंपेगा, अन्यथा ममता बनर्जी का नियंत्रण बरकरार रहेगा।
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