Mental Health
Mental Health : आज की अत्यधिक भागदौड़ भरी और प्रतिस्पर्धी जिंदगी में तनाव यानी स्ट्रेस हर व्यक्ति के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है। किसी व्यक्ति को ऑफिस में समय पर टारगेट पूरा करने की चिंता सताती है, तो कोई घरेलू जिम्मेदारियों, आर्थिक तंगहाली और पारिवारिक रिश्तों के आपसी तालमेल में उलझा रहता है। विडंबना यह है कि कई बार हम अपनी बेचैनी, लगातार बढ़ते चिड़चिड़ेपन और शारीरिक थकान की असली वजह को समय रहते समझ ही नहीं पाते हैं।
धीरे-धीरे यह अनियंत्रित तनाव सिर्फ हमारे दिमाग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हमारी गहरी नींद, आपसी रिश्तों, कार्यक्षमता और समग्र व्यवहार को पूरी तरह प्रभावित करने लगता है। वर्क स्ट्रेस और पर्सनल स्ट्रेस अक्सर एक-दूसरे में इस कदर मिक्स हो जाते हैं कि ऑफिस का गुस्सा घर पर निकलता है और घर के कलह से ऑफिस की परफॉर्मेंस खराब होने लगती है। इसलिए, इसके संकेतों को समय पर पहचानना बेहद जरूरी है।
यदि आप पहले स्वभाव से बेहद शांत और गंभीर रहते थे, लेकिन अब छोटी और मामूली बातों पर भी आपको तेज गुस्सा या चिड़चिड़ापन आने लगा है, तो समझ लें कि यह गंभीर मानसिक तनाव का शुरुआती संकेत है। चाहे ऑफिस का काम का दबाव हो या फिर घर-परिवार की कोई गुप्त चिंता, जब हमारा दिमाग लगातार दबाव की स्थिति में रहता है, तो व्यक्ति का अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कम हो जाता है। इसके चलते वह बात-बात पर अपनों पर झल्लाने लगता है, जिसका सीधा और नकारात्मक असर उसके परिवार, जीवनसाथी और दोस्तों के साथ बने-बनाए मधुर रिश्तों पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मत: “तनाव केवल एक मानसिक स्थिति नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारी शारीरिक ऊर्जा को सोख लेता है। अगर 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लेने के बाद भी सुबह उठते ही आपका शरीर भारी रहता है, तो यह क्रोनिक स्ट्रेस का लक्षण है।”
तनाव से ग्रसित लोग अक्सर यह शिकायत करते हैं कि उनका किसी भी रचनात्मक कार्य को करने का मन नहीं करता है या वे हर समय खुद को थका-थका और ऊर्जाविहीन महसूस करते हैं। यह स्थिति व्यक्ति को धीरे-धीरे अवसाद की ओर धकेलने लगती है।
जब किसी व्यक्ति के जीवन पर तनाव का बोझ बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो वह अनजाने में ही खुद को समाज और प्रियजनों से अलग-थलग करने लगता है। वह दोस्तों के फोन कॉल्स उठाना बंद कर देता है, सामाजिक आयोजनों में जाने से कतराता है और परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर बातचीत करने से भी बचने लगता है। अकेलेपन की यह चाहत दर्शाती है कि व्यक्ति मानसिक रूप से अंदर ही अंदर किसी बड़े द्वंद्व से जूझ रहा है और उसे इस समय सही मार्गदर्शन तथा भावनात्मक सहारे की सख्त जरूरत है।
यदि आपको रात में बिस्तर पर लेटने के बाद घंटों तक करवटें बदलनी पड़ती हैं, गहरी नींद नहीं आती, या रात में अचानक बार-बार आपकी आंखें खुल जाती हैं, तो यह तनाव का एक बहुत बड़ा और स्पष्ट संकेत है। जब दिमाग में भविष्य की चिंताएं या दफ्तर की परेशानियां लगातार घूमती रहती हैं, तो शरीर ‘फाइट या फ्लाइट’ मोड में रहता है, जिससे वह पूरी तरह रिलैक्स नहीं हो पाता। इसका सीधा असर अगले दिन की कार्यक्षमता और आपके मूड पर पड़ता है।
जब व्यक्ति की निजी या पारिवारिक परेशानियां बहुत अधिक बढ़ जाती हैं, तो उसके लिए ऑफिस के महत्वपूर्ण कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना लगभग असंभव हो जाता है। ठीक इसी तरह, जब कार्यस्थल का माहौल तनावपूर्ण होता है, तो घर का सुकून भी छिन जाता है। इस मानसिक उलझन के कारण व्यक्ति कार्यक्षेत्र में छोटी-छोटी गलतियां करने लगता है, महत्वपूर्ण निर्णय लेने में भ्रमित होता है और उसकी कुल प्रोडक्टिविटी (कार्य उत्पादकता) में भारी गिरावट दर्ज की जाती है।
तनाव केवल मस्तिष्क को ही नहीं, बल्कि हमारे पूरे शरीर को बीमार बनाता है। लगातार तनाव में रहने से क्रोनिक सिरदर्द, पेट की गड़बड़ी (एसिडिटी या अपच), कंधों और मांसपेशियों में अकड़न तथा अचानक दिल की धड़कन तेज होने जैसी शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं।
इस गंभीर मानसिक चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए अपनी दिनचर्या में निम्नलिखित सुधार करना अत्यंत आवश्यक है:
स्वयं के लिए समय निकालें: पूरे दिन की व्यस्तता में से कम से कम 20-30 मिनट का समय केवल अपने शौक, मेडिटेशन या वॉक के लिए निकालें।
अपनों से खुलकर बात करें: अपने मन के बोझ को दबाकर रखने के बजाय परिवार के सदस्यों या भरोसेमंद दोस्तों से साझा करें।
वर्क-लाइफ बैलेंस बनाएं: ऑफिस के काम को दफ्तर में ही छोड़ें, उसे घर की शांति पर हावी न होने दें।
एक्सपर्ट की मदद लें: यदि तनाव नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो बिना किसी संकोच के थेरेपिस्ट या काउंसलर से परामर्श लें।
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