Mohan Bhagwat
Mohan Bhagwat: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण सभा को संबोधित करते हुए संघ की छवि और उसके उद्देश्यों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भले ही स्वयंसेवक वर्दी पहनते हैं, दंड (लाठी) का अभ्यास करते हैं और अनुशासित पथ संचलन करते हैं, लेकिन इसे ‘अर्धसैनिक’ (Paramilitary) संगठन समझना एक बड़ी भूल होगी। भागवत ने जोर देकर कहा कि आरएसएस का मूल कार्य सेना तैयार करना नहीं, बल्कि समाज के भीतर नैतिक गुणों और सद्गुणों का विकास करना है। उनका उद्देश्य एक ऐसा चरित्रवान समाज बनाना है जो राष्ट्र की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे।
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने सूचना के आधुनिक स्रोतों पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में लोग किसी भी विषय की गहराई में जाने के बजाय ‘विकिपीडिया’ जैसे प्लेटफॉर्म पर भरोसा कर लेते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि संघ के खिलाफ एक नकारात्मक विमर्श (Narrative) गढ़ा जा रहा है और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध जानकारी हमेशा सत्य नहीं होती। उन्होंने जनता से आग्रह किया कि यदि वे संघ के वास्तविक स्वरूप को समझना चाहते हैं, तो उन्हें भरोसेमंद और प्राथमिक स्रोतों तक पहुंचना चाहिए। भागवत के अनुसार, संघ एक अनूठा संगठन है जिसे सतही जानकारी से नहीं समझा जा सकता।
संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में देशभर के दौरे पर निकले भागवत ने संगठन के जन्म से जुड़ी भ्रांतियों को दूर किया। उन्होंने कहा कि अक्सर यह माना जाता है कि आरएसएस की स्थापना किसी विशेष समुदाय या विचारधारा के विरोध या प्रतिक्रिया स्वरूप हुई थी, लेकिन यह सत्य नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ किसी से प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं बना है। इसका एकमात्र उद्देश्य भारतीय समाज को संगठित करना है ताकि भविष्य में भारत को फिर कभी गुलामी का सामना न करना पड़े। संघ का कार्य सकारात्मक और राष्ट्र निर्माण पर केंद्रित है।
इतिहास के पन्नों को पलटते हुए सरसंघचालक ने एक कड़वा सच साझा किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेज भारत पर आक्रमण करने वाले पहले विदेशी नहीं थे, बल्कि वे आठवें आक्रांता थे। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों मुट्ठी भर विदेशी लोग, जो धन, समृद्धि और सदाचार में भारतीयों से कहीं पीछे थे, बार-बार हमें हमारे ही घर में हराने में सफल रहे? भागवत ने कहा कि यह हार हमारी कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि समाज में एकता की कमी और बिखराव के कारण हुई। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक सबक बताते हुए कहा कि हमें अपनी गलतियों से सीखना होगा।
भाषण के समापन सत्र में भागवत ने समाज को आत्म-चिंतन का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आजादी की असली गारंटी हथियारों में नहीं, बल्कि समाज के चरित्र में छिपी है। यदि भारतीय समाज अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को त्यागकर राष्ट्रहित में एकजुट होता है, तो दुनिया की कोई भी शक्ति हमें पुनः अधीन नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि गुणों और मूल्यों से युक्त समाज ही एक उज्ज्वल भविष्य की नींव रख सकता है। संघ इसी “स्व” (स्वत्व) को जगाने का निरंतर प्रयास कर रहा है।
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