MP High Court Decision
MP High Court Decision: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड को किसी व्यक्ति की जन्मतिथि का अचूक या पक्का सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि सेवा संबंधी मामलों में कर्मचारी के ऑफिशियल सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि ही सर्वोपरि और मान्य होगी।
यह कानूनी विवाद धार जिले से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता ने एडिशनल कलेक्टर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत हीरालाल बाई (रेस्पॉन्डेंट नंबर 5) की पुनर्बहाली की गई थी। हीरालाल बाई पहले एक आंगनवाड़ी सहायक के रूप में कार्यरत थीं और सर्विस रिकॉर्ड के अनुसार 62 वर्ष की आयु पूरी करने पर सेवानिवृत्त हो चुकी थीं। उनके रिटायर होने के बाद, पद खाली हुआ और विभाग ने उचित चयन प्रक्रिया का पालन करते हुए याचिकाकर्ता को जून 2018 में नियुक्त किया।
विवाद तब बढ़ा जब हीरालाल बाई ने अपने रिटायरमेंट के लगभग दो साल बाद एक अपील दायर की। उन्होंने दावा किया कि उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि (5 मार्च, 1955) गलत थी। उन्होंने अपने आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड के आधार पर तर्क दिया कि उनकी असली जन्मतिथि 1 जनवरी, 1964 है। एडिशनल कलेक्टर ने इस दावे को स्वीकार कर लिया, जिससे याचिकाकर्ता को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी, क्योंकि वहां केवल एक ही पद स्वीकृत था।
जस्टिस की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि कोई कर्मचारी अपने पूरे सेवाकाल के दौरान सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि को स्वीकार करता है, तो उसे रिटायरमेंट के बाद चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा अवधि, वरिष्ठता (Seniority) और सेवानिवृत्त होने की तिथि तय करने के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड ही एकमात्र कानूनी आधार है। अगर इसमें कोई त्रुटि थी, तो उसे सेवा की शुरुआत में या उचित समय के भीतर ठोस सबूतों के साथ चुनौती दी जानी चाहिए थी।
अदालत ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु उठाया कि आधार कार्ड मुख्य रूप से एक पहचान पत्र है, न कि जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण। इसी तरह वोटर आईडी भी नागरिकता और पहचान के लिए है। कोर्ट के अनुसार, इन दस्तावेजों में दर्ज जानकारी को सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज और सत्यापित जानकारी के ऊपर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब मामला किसी कर्मचारी की रिटायरमेंट की उम्र से जुड़ा हो।
हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता को पद से हटाने से पहले उनकी बात सुनने का कोई मौका नहीं दिया गया। कोर्ट ने ‘ऑडी अल्टरम पार्टम’ (दूसरे पक्ष को भी सुनो) के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी प्रशासनिक आदेश, जिसका व्यक्ति के करियर पर गहरा असर पड़ता हो, उसमें प्राकृतिक न्याय के नियमों का पालन अनिवार्य है। बिना सुनवाई के किसी को नौकरी से निकालना पूरी तरह असंवैधानिक है।
अंततः, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एडिशनल कलेक्टर के आदेश को अमान्य करार दिया। कोर्ट ने माना कि हीरालाल बाई आधिकारिक रूप से 2017 में ही रिटायर हो चुकी थीं और आधार कार्ड के आधार पर उन्हें वापस सेवा में लेना गलत था। बेंच ने याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द कर दिया और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को तुरंत उनके पद पर बहाल किया जाए।
Jhansi Love Affair : उत्तर प्रदेश के झांसी जिले से एक ऐसी प्रेम कहानी सामने…
Sarai Rohilla Murder : देश की राजधानी दिल्ली के सराय रोहिल्ला इलाके में शनिवार को…
Karanvir Bohra Journey : एकता कपूर के कालजयी धारावाहिक 'कसौटी जिंदगी की' से घर-घर में…
Odisha Bank Skeleton Case : ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष…
Surguja Gangrape Case : छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में दो नाबालिग लड़कियों के साथ हुए…
Kanker Blast : नियति की क्रूरता कई बार इंसान की कल्पना से परे होती है।…
This website uses cookies.