NEET PG 2026
NEET PG 2026: देश के चिकित्सा जगत में उस समय हड़कंप मच गया जब केंद्र सरकार और नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (NBEMS) ने मेडिकल पोस्टग्रेजुएट (PG) सीटों को भरने के लिए कटऑफ में ऐतिहासिक कमी करने का फैसला किया। इस निर्णय के खिलाफ रेजिडेंट डॉक्टरों ने मोर्चा खोल दिया है और अब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट तक पहुँच गया है।
यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) ने केंद्र सरकार के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसके तहत पीजी मेडिकल सीटों के लिए क्वालीफाइंग कटऑफ को घटाकर जीरो पर्सेंटाइल कर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सीटों को भरने की होड़ में मानकों को इतना नीचे गिराना चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ है। डॉक्टरों का संगठन इसे ‘मेरिट की हत्या’ करार दे रहा है, क्योंकि अब माइनस 40 स्कोर करने वाले छात्र भी विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की दौड़ में शामिल हो सकेंगे।
आंकड़ों के अनुसार, देशभर के मेडिकल कॉलेजों में पीजी कोर्स की लगभग 18,000 सीटें खाली पड़ी हैं। सरकार का तर्क है कि इन सीटों को बेकार जाने से बचाने के लिए कटऑफ में गिरावट अनिवार्य थी। हालांकि, UDF के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल और जनरल सेक्रेटरी डॉ. अरुण कुमार का कहना है कि सीटें खाली रहने के पीछे अन्य संरचनात्मक कारण हो सकते हैं, लेकिन न्यूनतम योग्यता मानकों को खत्म कर देना इसका समाधान नहीं है। इससे भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
दाखिले की नई प्रक्रिया के तहत जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। सामान्य वर्ग (General) और EWS उम्मीदवारों के लिए जो मानक पहले 50 पर्सेंटाइल था, उसे अब घटाकर केवल 7 पर्सेंटाइल कर दिया गया है। इसी तरह, SC, ST और OBC उम्मीदवारों के लिए भी मानकों में भारी कटौती की गई है। दिव्यांग श्रेणी (PwBD) के उम्मीदवारों के लिए कटऑफ 45 से घटाकर मात्र 5 पर्सेंटाइल कर दी गई है। डॉक्टरों का कहना है कि इतने कम स्कोर पर दाखिला मिलना चिकित्सा पेशे की साख को कमजोर करता है।
डॉक्टरों ने अपनी जनहित याचिका में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि यदि जीरो या नकारात्मक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी विशेषज्ञ डॉक्टर बनेंगे, तो वे जटिल सर्जरी और इलाज कैसे करेंगे? डॉ. लक्ष्य मित्तल के अनुसार, पीजी मेडिकल ट्रेनिंग बहुत ही संवेदनशील होती है। बिना पर्याप्त ज्ञान और योग्यता के डॉक्टरों को ट्रेनिंग देना न केवल मरीजों की जान जोखिम में डालना है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के प्रति जनता के भरोसे को भी तोड़ देगा।
इस विवाद के बीच फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (FORDA) ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर इस फैसले पर नाराजगी जताई है। पत्र में मांग की गई है कि सरकार इस “अतार्किक” कटौती पर तुरंत पुनर्विचार करे। फोर्डा ने तर्क दिया है कि यह फैसला उन मेहनती छात्रों के साथ सरासर अन्याय है जिन्होंने वर्षों तक कड़ी मेहनत करके अच्छे अंक प्राप्त किए हैं। संगठन ने सरकार से अपील की है कि चिकित्सा शिक्षा की गरिमा को बनाए रखने के लिए न्यूनतम क्वालिफाइड मानकों को बहाल किया जाए।
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