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बिहार में होली के त्योहार के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति की धुरी रहे हैं, अब पटना छोड़कर दिल्ली का रुख कर रहे हैं। जदयू (JDU) नेताओं ने इस बात की पुष्टि की है कि नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करेंगे। इस फैसले ने न केवल विपक्षी दलों को चौंका दिया है, बल्कि जदयू कार्यकर्ताओं के भीतर भी असंतोष और विरोध की लहर पैदा कर दी है। समर्थकों के लिए यह यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा है कि ‘सुशासन बाबू’ अब राज्य की सक्रिय सत्ता से दूर होकर संसदीय राजनीति के ऊपरी सदन में अपनी भूमिका निभाएंगे।
हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए (NDA) ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था। गठबंधन ने कुल 243 सीटों में से 202 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी। सीटों के गणित को देखें तो भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि जदयू को 85 सीटें मिलीं। चिराग पासवान की एलजेपीआर (LJPR) ने 19, जीतन राम मांझी की ‘हम’ (HAM) ने 5 और आरएलएम (RLM) ने 4 सीटों पर कब्जा जमाया था। वर्तमान व्यवस्था में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे, लेकिन सूत्रों का दावा है कि उनके दिल्ली जाने के बाद अब मुख्यमंत्री का पद भाजपा के खाते में जा सकता है। बदले में, जदयू को दो उपमुख्यमंत्री के पद दिए जाने की संभावना जताई जा रही है।
मुख्यमंत्री की रेस में सबसे पहला और कद्दावर नाम नित्यानंद राय का है। नित्यानंद राय को केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी का बेहद करीबी माना जाता है। विधानसभा चुनाव के दौरान टिकटों के बंटवारे से लेकर गठबंधन के सहयोगियों को एकजुट रखने तक, राय ने पर्दे के पीछे रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पार्टी के भीतर उनकी संगठनात्मक क्षमता और यादव वोट बैंक पर उनकी पकड़ उन्हें इस पद के लिए सबसे प्रबल दावेदार बनाती है। भाजपा आलाकमान उन पर भरोसा जताकर बिहार में एक नए नेतृत्व की नींव रख सकता है।
सीएम पद की दौड़ में दूसरा सबसे बड़ा नाम मौजूदा उपमुख्यमंत्री और बिहार के गृह मंत्री सम्राट चौधरी का है। सम्राट चौधरी को उनकी आक्रामक राजनीति और पिछड़े वर्गों (OBC) के बीच गहरी पैठ के लिए जाना जाता है। चुनाव जीतने के तुरंत बाद उन्हें गृह मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपना इस बात का संकेत था कि भाजपा उन्हें भविष्य के बड़े रोल के लिए तैयार कर रही है। उनके समर्थकों का मानना है कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में भाजपा बिहार में अपनी स्वतंत्र पहचान को और अधिक मजबूती से स्थापित कर पाएगी।
नीतीश कुमार के इस कदम के बाद बिहार में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया काफी संवेदनशील हो सकती है। जहां एक ओर भाजपा अपने मुख्यमंत्री के जरिए राज्य पर सीधा नियंत्रण चाहेगी, वहीं जदयू यह सुनिश्चित करना चाहेगी कि सत्ता में उसकी हिस्सेदारी और प्रभाव कम न हो। अगले मुख्यमंत्री की रेस में इन दो नामों के अलावा कुछ अन्य चौंकाने वाले चेहरे भी सामने आ सकते हैं। बिहार की जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें अब राजभवन की गतिविधियों पर टिकी हैं, क्योंकि होली के इस ‘धमाके’ ने राज्य की सियासत की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी है।
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