छत्तीसगढ़

राज्य नहीं, राजाओं का उत्सव — आम आदमी की पहुँच से दूर राज्योत्सव, आलेख पढ़ें उमाकांत पांडेय की कलम से

सिर्फ लोहा ही नहीं कोयला हीरा टीन बॉक्साइट लाइम स्टोन डोलोमाइट यहां तक लिथियम तक उगलती है रत्नगर्भा वसुंधरा छत्तीसगढ़, इतनी अमीर धरती मगर लोग अब भी गरीब।।

राज्य का नहीं राजाओं का उत्सव

राज्योत्सव रईसों का उत्सव, आम आदमी का नहीं। आम आदमी तो पहुंच भी नहीं पाता उत्सवस्थल तक, वो तो लगा रहता है, लोहे के पहाड़ काट काट कर अपनी जिंदगी का रास्ता बनाने में। ऐसे ही नहीं मैं छत्तीसगढ़ को रत्नगर्भा वसुंधरा कहता हूँ, मैं भूविज्ञान / जियोलॉजी का पोस्ट ग्रेजुएट हूं, इसलिए ऐसा कहता आया हूँ।क्या नहीं देती है छत्तीसगढ़ की ममतामई धरा हमको। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या सारी नामी गिरामी सीमेंट कम्पनियां यहां आती, अपने प्लांट लगाती। सामरिक महत्व की धातु टीन तो पूरे देश में छत्तीसगढ़ में ही मिलती है। एल्यूमिनियम/बॉक्साइट उत्पादन में भी छत्तीसगढ़ का देश में तीसरा स्थान है।

कोयले और लोह की खदाने तो सारे देश में अपनी अलग पहचान रखती है और सिर्फ बैलाडीला में ही नहीं पूरे बस्तर में लोहे के पहाड़ है, पहाड़ खदान नहीं। फिर जिस हीरे की रॉयल्टी से ही राज्य को टैक्स फ्री जोन बनाने की घोषणा हुई थी, वो तो पता नहीं कहां गुम हो गई, मगर हीरा खदाने तो है छत्तीसगढ़ में। अगर ऐसा नहीं होता तो दुनिया की जानी मानी हीरा उत्पादक कंपनिया यहां आने की कोशिश नहीं करती। फिर हीरे का ही विशिष्ट प्रकार एलेक्जेंड्राइट भी यहां मिलता है, मगर पता नहीं क्यों ध्यान सिर्फ लोहा और कोयला पर ही रहा।

फिर बिजली उत्पादन में भी छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भर है।सरप्लस एनर्जी स्टेट छत्तीसगढ़ अन्य राज्यों को भी आपूर्ति करता है। मगर दुःख तब होता है जब यहां बिजली की कटौती होती है, उसकी दर में इजाफा होता है।

धान का कटोरा तो है ही छत्तीसगढ़। उसके अलावा वनोपज में भी वो अन्य राज्यों से कही कम नहीं है। बीड़ी पत्ता, महुवा, आंवला, इमली, चिरौंजी और अब तो काजू, चाय, लीची भी देना लगा है छत्तीसगढ़। क्या नहीं है देती है ये #अमीरधरती लेकिन दुर्भाग्य से वो सब #गरीबलोग तक पहुंच ही नहीं पाता, मुट्ठी भर लोगो के हाथों में जाकर गायब हो जाता है।

खनिजों के खजाने बस्तर के लोगों को सल्फी ताड़ी और महुवा में डुबाए रखकर खुद स्कॉच/शैम्पेन का मजा लेने वालो के लिए है शायद ये राज्योत्सव। वरना इतनी अमीर धरती के लोग इतने गरीब नहीं होना चाहिए। दरअसल ईमानदारी से आम आदमी के उत्थान के लिए कोई प्रयास किए ही नहीं गए। हां मुट्ठी भर अमीरों ने अपनी अमीरी बढ़ाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी, शायद उसी का उत्सव है, ये राजाओं का उत्सव, राज्योत्सव।

साभार: वरिष्ठ पत्रकार उमाकांत पांडेय का आलेख

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