ONGC CSR Fund Row: कर्नाटक की राजनीति में इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पंजीकरण और उसके वित्तीय स्रोतों को लेकर एक नया और बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस साल जून के महीने में कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खरगे ने सार्वजनिक रूप से आरएसएस और उसके फंड पर गंभीर सवाल खड़े किए थे और संगठन के अनिवार्य पंजीकरण की मांग उठाई थी। इस मांग का जवाब देते हुए आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने पंजीकरण की आवश्यकता को साफ तौर पर खारिज कर दिया था और इसके पीछे कई तर्क दिए थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि संघ केवल लोगों का एक साधारण समूह है और सरकार को इसके अस्तित्व की पूरी जानकारी है क्योंकि स्थापना के बाद से इस संगठन पर कई बार प्रतिबंध भी लगाए जा चुके हैं।

मोहन भागवत का तर्क: हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं है
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने तर्कों में यह भी कहा था कि जिस प्रकार सनातन हिंदू धर्म किसी सरकारी दस्तावेज में रजिस्टर्ड नहीं है, उसी प्रकार संघ को भी कानूनी रूप से पंजीकृत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार, पंजीकरण की अनिवार्यता केवल उन संस्थाओं के लिए होती है जो सरकार से किसी प्रकार का वित्तीय अनुदान या फंड मांगती हैं। संघ का हमेशा से यह दावा रहा है कि उसे बाहरी या सरकारी धन की कोई आवश्यकता नहीं है। उनके मुताबिक, संगठन पूरी तरह से टैक्स-फ्री स्वैच्छिक योगदान से चलता है, जिसे स्वयंसेवक ‘गुरुदक्षिणा’ यानी शिक्षक को दी जाने वाली पारंपरिक भेंट के रूप में अपनी इच्छा से अर्पित करते हैं।

ONGC द्वारा आरएसएस से जुड़े संगठनों को भारी फंडिंग का खुलासा
संघ के इन दावों के बीच हाल ही में एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) ने वर्ष 2013 से लेकर अब तक संघ से जुड़े लगभग 20 विभिन्न संगठनों को भारी-भरकम 670.97 करोड़ रुपये का दान दिया है। इस कुल राशि में से 3 करोड़ से थोड़ी कम रकम 2013 से 2015 के बीच 20 में से तीन प्रमुख संगठनों को दी गई थी, जबकि बाकी का अधिकांश फंड उसके बाद के अगले दस वर्षों के दौरान चरणों में जारी किया गया।
कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड से किया गया योगदान
ओएनजीसी ने यह सारा वित्तीय योगदान अपने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड के माध्यम से किया है। इस विशेष फंड के जरिए कंपनी हर साल देश भर के अलग-अलग कल्याणकारी संगठनों और प्रोजेक्ट्स को सैकड़ों करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देती है। ओएनजीसी की सीएसआर वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2015 की पहली तिमाही से लेकर 2025 की पहली तिमाही तक, कंपनी ने पूरे भारत में 2,000 से अधिक विभिन्न संगठनों और सामाजिक परियोजनाओं को कुल 4,531 करोड़ रुपये दान किए हैं। इस कुल राशि का लगभग 14.7% हिस्सा यानी 668.01 करोड़ रुपये उन 20 संगठनों को मिले जिनकी पहचान आरएसएस से जुड़े संगठनों के रूप में की गई है।
कर्नाटक कांग्रेस ने उठाए गंभीर सवाल और पारदर्शिता की मांग
इस खुलासे के बाद कर्नाटक कांग्रेस ने इस पूरे मामले पर आक्रामक रुख अपनाते हुए कड़े सवाल उठाए हैं। कर्नाटक कांग्रेस के नेता बीके हरिप्रसाद ने ओएनजीसी का सीएसआर कोष आरएसएस से जुड़ी संस्थाओं को दिए जाने पर गहरी आपत्ति जताई है। उन्होंने सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल में अधिक पारदर्शिता और पूर्ण जवाबदेही तय करने की मांग की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि पिछले एक दशक में ओएनजीसी के सीएसआर फंड का 668 करोड़ रुपया आरएसएस से जुड़ी संस्थाओं को दिया जाना गंभीर चिंता का विषय है, जिस पर देश की जनता को जवाब मिलना चाहिए।
संघ के दावों पर उठे सवाल और ओएनजीसी की चुप्पी बरकरार
कांग्रेस नेताओं ने आरएसएस के उस दावे पर भी कड़ा प्रहार किया जिसमें वह खुद को सरकारी वित्त पोषण से दूर रखने की बात कहता है। कांग्रेस का कहना है कि जब सार्वजनिक संस्थानों और करदाताओं के पैसे से चलने वाले संसाधनों से आपकी सहयोगी संस्थाओं को भारी फंड मिल रहा है, तो फिर यह दावा कैसे किया जा सकता है कि संगठन को सरकारी धन नहीं मिलता है। बहस अब केवल पंजीकरण के दायरे से आगे बढ़कर जनता के पैसे के उपयोग में पारदर्शिता और नैतिकता तक पहुंच चुकी है। हालांकि, इन तीखे राजनीतिक हमलों और आरोपों के बीच फिलहाल ओएनजीसी प्रबंधन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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