SIR Controversy : चुनाव आयोग (ECI) और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद के बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने मौजूदा घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि SIR को लेकर मतदाताओं के बीच डर पैदा होना लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है। रावत ने चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को भी गंभीर मामला बताया।
चुनाव आयोग में सर्वसम्मति से होते थे फैसले
समाचार एजेंसी PTI से बातचीत में ओपी रावत ने कहा कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने चुनाव आयोग में फैसले आमतौर पर सर्वसम्मति से होते देखे। उनका कहना था कि यदि किसी मुद्दे पर सदस्यों के बीच मतभेद होता भी था, तो बातचीत और सहमति के जरिए एक साझा निर्णय तक पहुंचने का प्रयास किया जाता था। रावत के मुताबिक, मौजूदा घटनाक्रम चुनाव आयोग की पारंपरिक कार्यप्रणाली से अलग दिखाई देता है।
‘SIR ने मतदाताओं के मन में डर पैदा किया’
ओपी रावत ने SIR को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया ने मतदाताओं के बीच भय की स्थिति पैदा कर दी है। उन्होंने SIR की तुलना ‘फ्रेंकस्टीन’ से करते हुए कहा कि इससे लोगों के मन में डर पैदा होना लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। रावत के ये विचार उनकी व्यक्तिगत टिप्पणी हैं और SIR को लेकर राजनीतिक दलों तथा चुनाव आयोग के बीच पहले से चल रही बहस के बीच आए हैं।
जनता के भरोसे को लेकर उठाए सवाल
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग में जनता के भरोसे को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग पर लोगों का भरोसा इसलिए रहा है क्योंकि संस्था से निष्पक्ष, स्वतंत्र और विश्वसनीय चुनाव कराने की अपेक्षा की जाती है। रावत के अनुसार, मौजूदा विवादों के कारण इस भरोसे पर असर पड़ने का खतरा है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय बताया।
Form-6 में बदलाव पर रावत की आपत्ति
रावत ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में किए गए बदलावों को भी गंभीर मुद्दा बताया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने Form-6 में बदलाव को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं। रावत ने कहा कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव केवल प्रशासनिक निर्देशों के जरिए नहीं किया जाना चाहिए और इस मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। उन्होंने बदलाव को गलत और गैरकानूनी बताया।
चुनाव आयोग के भीतर 14 आपत्तियों की रिपोर्ट
यह पूरा विवाद उस रिपोर्ट के बाद बढ़ा है जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, इन मुद्दों में मतदाता नाम जोड़ने और हटाने, Form-6 में बदलाव तथा मतदाता डेटाबेस के नियंत्रण से जुड़े मामले शामिल थे।
चुनाव आयोग ने मतभेदों के दावे को नकारा
वहीं, चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने इन रिपोर्टों के बाद स्पष्ट किया कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति में लिए गए हैं। आयोग के अनुसार, किसी मुद्दे पर सदस्यों द्वारा चिंता या चर्चा होना अलग बात है, लेकिन अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। इस तरह पूर्व चुनाव आयुक्त की चिंताओं के बीच चुनाव आयोग ने अपनी निर्णय प्रक्रिया को लेकर अलग पक्ष रखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है। 22 सितंबर को अदालत ने दिल्ली में मतदाताओं को भेजे गए कुछ नोटिसों के तरीके पर सवाल उठाते हुए उन्हें प्रथम दृष्टया ‘मैकेनिकल’ तरीके से जारी किए जाने की बात कही। अदालत ने चुनाव आयोग से ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी और मतदाताओं को जवाब देने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा।
लोकतंत्र में भरोसा बना रहना जरूरी
ओपी रावत ने मौजूदा विवाद के संदर्भ में चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता और मतदाताओं के भरोसे को महत्वपूर्ण बताया। वहीं आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और अपात्र या डुप्लीकेट नामों को हटाना है। ऐसे में SIR को लेकर जारी बहस में एक तरफ प्रक्रिया और कानूनी प्रावधानों पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ आयोग अपनी प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बता रहा है।
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