Owaisi Shoe Incident: ओवैसी का जूता कांड पर तीखा बयान, ‘यह सुप्रीम कोर्ट का अपमान और जातिवाद का प्रतीक है’

Owaisi Shoe Incident: ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान न्यायमूर्ति बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे न केवल सर्वोच्च न्यायालय का अपमान बताया, बल्कि देश में बढ़ते कट्टरपंथ और जातिवादी मानसिकता का चिंताजनक संकेत भी करार दिया।

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ANI को दिए इंटरव्यू में ओवैसी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि, “जिस व्यक्ति ने यह हरकत की वह 70 साल का है और कट्टरपंथी हो चुका है। यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सुप्रीम कोर्ट का अपमान है।” उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बी.आर. गवई के उस फैसले पर भी असहमति जताई जिसमें उन्होंने केस दर्ज न करने की बात कही थी।

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“यह सिर्फ एक जज पर हमला नहीं, दलितों पर हमला है”

ओवैसी ने कहा कि यह मुद्दा केवल जस्टिस गवई का नहीं है, बल्कि यह दलित समुदाय के खिलाफ बढ़ती नफरत और हिंसा की गंभीर अभिव्यक्ति है। उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2023 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि हर दिन औसतन 12 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है और दलितों के खिलाफ सबसे अधिक अपराध उत्तर प्रदेश में दर्ज होते हैं।

“अगर नाम असद होता तो अब तक…?”

दिल्ली पुलिस की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाते हुए ओवैसी ने तीखा हमला किया। उन्होंने कहा, “अगर आरोपी का नाम किशोर नहीं, बल्कि असद होता, तो अब तक क्या होता? क्या सरकार तब भी इतनी ठंडी प्रतिक्रिया देती?” उन्होंने इसे जातिवाद और साम्प्रदायिकता से जोड़ते हुए कहा कि यह घटना न्याय प्रणाली और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा सवाल खड़ा करती है।

“कल जूता फेंका, आगे और क्या होगा?”

ओवैसी ने चेताया कि इस तरह की घटनाओं से समाज में गलत संदेश जा रहा है। उन्होंने कहा, “आज उन्होंने जूता फेंका है, कल को कुछ और करेंगे। अगर इस पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह सिलसिला आगे भी बढ़ सकता है।”

“बाबरी विध्वंस पर भी कोई सजा नहीं”

1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस का जिक्र करते हुए ओवैसी ने कहा कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद किसी को सजा नहीं मिली। “एक भी दोषी नहीं ठहराया गया। तीन तलाक पर फैसला आया, हमने आलोचना की, पर कभी किसी जज पर हमला नहीं किया। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंका गया और वह भी दलित जज पर – यह बहुत शर्मनाक है।”

असदुद्दीन ओवैसी के इस बयान ने एक बार फिर न्यायपालिका की गरिमा, जातीय-सामाजिक न्याय और कट्टरपंथ के खतरों पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट की गरिमा की रक्षा के साथ-साथ देश में जातिवाद और असहिष्णुता पर सख्त रुख अपनाने की ज़रूरत अब पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

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