SIR Controversy : स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस लगातार तेज हो रही है। इसी बीच अर्थशास्त्री और लेखक परकला प्रभाकर ने इस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। चेन्नई के पेरियार थिडल में ‘मूवमेंट फॉर रिट्रीविंग वोटर राइट्स’ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने SIR को केवल चुनावी प्रक्रिया का विषय मानने के बजाय इसके व्यापक राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रभावों पर चर्चा की।
SIR को लेकर लगाया ‘सवर्ण हिंदू राष्ट्र’ बनाने का आरोप
कार्यक्रम में परकला प्रभाकर ने आरोप लगाया कि SIR भारत को ‘सवर्ण हिंदू राष्ट्र’ की दिशा में ले जाने की कोशिश का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया का विरोध केवल चुनावी मुद्दे के तौर पर नहीं, बल्कि बुनियादी स्तर पर होना चाहिए। प्रभाकर के मुताबिक, इस विरोध का आधार यह होना चाहिए कि SIR देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक भागीदारी को किस दिशा में प्रभावित कर सकता है। यह उनका राजनीतिक विश्लेषण और आरोप है, न कि चुनाव आयोग द्वारा स्वीकार किया गया निष्कर्ष।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने को लेकर उठाए सवाल
प्रभाकर ने दावा किया कि मतदाता सूची से हटाए गए लोगों में मुसलमान, ईसाई, दलित, आदिवासी और अन्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लोग बड़ी संख्या में शामिल हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी प्रक्रिया के कारण इन समुदायों के लोगों के नाम प्रभावित होते हैं, तो इसके सामाजिक और राजनीतिक परिणाम क्या होंगे। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या यह आखिरी SIR होगा या भविष्य में मतदाता सूची के ऐसे और पुनरीक्षण किए जाएंगे।
‘Ban EVM, Reject SIR’ कार्यक्रम में शामिल हुए प्रभाकर
चेन्नई के पेरियार थिडल में आयोजित कार्यक्रम का विषय ‘Ban EVM, Reject SIR’ रखा गया था। इसमें प्रभाकर ने हाल में हुए SIR और कुछ वर्ष पहले किए गए मतदाता सूची पुनरीक्षणों के बीच अंतर पर भी बात की। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया, मतदाता अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर चिंता जताई। हाल के महीनों में SIR को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक समाज के कुछ वर्गों की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं।
राजनीतिक दलों से एकजुट होने की अपील
परकला प्रभाकर ने राजनीतिक दलों से SIR के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने की अपील की। उन्होंने यहां तक कहा कि विपक्षी दलों को चुनावों में हिस्सा लेने से भी इनकार करने पर विचार करना चाहिए। उनका तर्क था कि मौजूदा व्यवस्था में चुनाव लड़ना कथित अनियमितताओं को वैधता देने जैसा होगा। यह प्रभाकर की व्यक्तिगत राजनीतिक राय है और सभी विपक्षी दलों की साझा स्थिति के रूप में इसे नहीं देखा जा सकता।
EVM के इस्तेमाल पर भी जताई आपत्ति
कार्यक्रम के दौरान प्रभाकर ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि EVM से संबंधित कई प्रश्न अभी भी उनके अनुसार अनसुलझे हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनावों का अध्ययन किया है और चुनाव परिणाम को लेकर गंभीर आपत्तियां हैं। प्रभाकर ने 2024 के जनादेश को ‘चुराया हुआ जनादेश’ बताया। यह उनका आरोप है; इसे स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
SIR पर चुनाव आयोग का अपना पक्ष भी मौजूद
SIR को लेकर चुनाव आयोग की ओर से अलग प्रक्रिया और स्पष्टीकरण भी जारी किए गए हैं। आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर SIR के तहत मतदाता अपने नाम को पिछले SIR के रिकॉर्ड में खोज सकते हैं और आवश्यक स्थिति में संबंधित प्रक्रियाओं के माध्यम से दावा या आपत्ति दर्ज कर सकते हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
SIR विवाद के बीच लोकतंत्र और मतदाता अधिकार पर बहस
SIR को लेकर जारी विवाद अब केवल मतदाता सूची के तकनीकी पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रहा है। इसके साथ मतदाता अधिकार, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, EVM और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका जैसे मुद्दे भी बहस का हिस्सा बन गए हैं। आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों, नागरिक संगठनों और चुनाव आयोग के पक्ष से सामने आने वाले तर्क इस बहस को और प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में SIR की प्रक्रिया और उससे जुड़े आधिकारिक आंकड़ों को समझना महत्वपूर्ण होगा।
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