अंतरराष्ट्रीय

Paris Security Conference: पेरिस सुरक्षा सम्मेलन, रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए मैक्रों की बड़ी पहल और शांति रणनीति

Paris Security Conference: रूस और यूक्रेन के बीच पिछले लगभग चार वर्षों से जारी भीषण युद्ध ने अब एक ऐसे मोड़ पर दस्तक दी है, जहाँ वैश्विक शक्तियाँ सीधे हस्तक्षेप की तैयारी कर रही हैं। हाल ही में फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित एक उच्चस्तरीय सुरक्षा बैठक ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस बैठक को रूसी आक्रामकता को समाप्त करने और क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक “ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण कदम” करार दिया है। युद्ध की विभीषिका के बीच, यह बैठक यूक्रेन के अस्तित्व और यूरोप की सुरक्षा के लिए निर्णायक मानी जा रही है।

शांति स्थापना के लिए पेरिस में महामंथन और मैक्रों की रणनीति

राष्ट्रपति मैक्रों ने पेरिस शिखर सम्मेलन के बाद स्पष्ट किया कि यह बैठक केवल चर्चा तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें ठोस कार्ययोजनाओं पर बात हुई। मैक्रों और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के बीच हुई निजी मुलाकात ने इस सम्मेलन की आधारभूमि तैयार की थी। बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु यह था कि कैसे रूस को युद्धविराम (सीजफायर) के लिए मजबूर किया जाए और यूक्रेन की संप्रभुता को सुरक्षित रखा जाए। मैक्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब केवल बयानबाजी से आगे बढ़कर जमीन पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपायों पर विचार कर रहा है।

25 देशों की भागीदारी और बहुराष्ट्रीय सेना की तैनाती पर चर्चा

इस महत्वपूर्ण बैठक में अमेरिका सहित दुनिया के 25 से अधिक प्रभावशाली देशों ने हिस्सा लिया। विचार-विमर्श का दायरा काफी व्यापक था, जिसमें संघर्ष विराम की निगरानी के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित करना, यूक्रेनी सेना को अत्याधुनिक हथियारों की आपूर्ति जारी रखना और सैनिकों को उच्च स्तरीय प्रशिक्षण देना शामिल था। सबसे महत्वपूर्ण चर्चा एक बहुराष्ट्रीय सेना की तैनाती को लेकर हुई, जो भविष्य में रूस के किसी भी संभावित हमले को रोकने के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करेगी। हालांकि, इस योजना की कई तकनीकी जटिलताओं और बारीकियों को अंतिम रूप देना अभी शेष है।

अमेरिकी नेतृत्व में संघर्ष विराम की निगरानी और सुरक्षा गारंटी

सम्मेलन में एक बड़ा फैसला यह लिया गया कि यदि रूस और यूक्रेन के बीच कोई संघर्ष विराम होता है, तो उसकी निगरानी की जिम्मेदारी अमेरिकी नेतृत्व में सौंपी जाएगी। सहयोगी देशों ने इस बात पर जोर दिया कि केवल युद्ध रोकना ही काफी नहीं है, बल्कि यूक्रेन को लंबे समय तक रक्षा सहयोग प्रदान करना आवश्यक है। इसके तहत जमीन, समुद्र और हवा—तीनों मोर्चों पर एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार करने की योजना है। सहयोगी देशों का मानना है कि यूक्रेन को तब तक समर्थन मिलता रहेगा जब तक वह आत्मनिर्भर होकर अपनी सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम नहीं हो जाता।

जेलेंस्की की अपील: ब्रिटेन और फ्रांस से सैन्य सहयोग की मांग

यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने इस मंच का उपयोग यूरोपीय शक्तियों से सीधी मदद माँगने के लिए किया। उन्होंने विशेष रूप से ब्रिटेन और फ्रांस से अपील की कि वे अपने सैनिकों, हथियारों और तकनीकी विशेषज्ञों की तैनाती में तेजी लाएं। जेलेंस्की ने तर्क दिया कि रूसी दबाव को झेलने के लिए यूरोपीय सशस्त्र सेनाओं की प्रत्यक्ष प्रतिबद्धता अनिवार्य है। हालांकि, कई देशों के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि सैनिकों की तैनाती का निर्णय उनकी राष्ट्रीय संसदों की मंजूरी पर निर्भर करता है, जिसके कारण कुछ देशों की ओर से अभी तक पूर्ण सैन्य प्रतिबद्धता की स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है।

जेरेड कुशनर की उपस्थिति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मायने

बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधित्व ने सबका ध्यान आकर्षित किया। विशेष रूप से नवनिर्वाचित नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले स्टीव विटकॉफ और डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर की मौजूदगी ने संकेत दिया कि आने वाले समय में अमेरिकी विदेश नीति यूक्रेन संकट को लेकर क्या रुख अपना सकती है। इन प्रमुख चेहरों की भागीदारी से यह स्पष्ट होता है कि यूक्रेन का मुद्दा वैश्विक भू-राजनीति में सर्वोच्च प्राथमिकता पर बना हुआ है और अमेरिका शांति समझौतों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है।

रूस का अड़ियल रुख और भविष्य की अनिश्चितता

इन तमाम वैश्विक प्रयासों के बावजूद, रूस की प्रतिक्रिया अभी भी ठंडी और चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। क्रेमलिन ने अब तक पेरिस बैठक पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन रूस का पुराना रुख यह रहा है कि वह किसी भी छोटे-मोटे युद्धविराम को स्वीकार नहीं करेगा। रूस की मांग है कि जब तक एक व्यापक और स्थायी शांति समझौता नहीं होता, जो उसके हितों की रक्षा करे, तब तक वह अपनी सैन्य कार्रवाई बंद नहीं करेगा। फ्रांस और अन्य सहयोगी देशों का मानना है कि असली प्रगति तभी संभव होगी जब रूस मेज पर आकर बातचीत करने के लिए तैयार होगा। फिलहाल, दुनिया की नजरें रूस के अगले कदम पर टिकी हैं।

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