Parliamentary Diplomacy
Parliamentary Diplomacy: भारत की सॉफ्ट पावर और वैश्विक कूटनीति को नए स्तर पर ले जाने के उद्देश्य से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। दुनिया के 60 से अधिक देशों के साथ भारत के विधायी संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए ‘संसदीय मैत्री समूहों’ (Parliamentary Friendship Groups) का गठन किया गया है। इस पहल का मूल उद्देश्य पारंपरिक सरकारी कूटनीति के साथ-साथ विधायी स्तर पर भी अन्य देशों की संसदों के साथ प्रत्यक्ष, नियमित और सार्थक संवाद स्थापित करना है। यह कदम वैश्विक मंच पर भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना को प्रदर्शित करता है।
इन संसदीय मैत्री समूहों की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सर्वदलीय संरचना है। इसमें सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों के वरिष्ठ और अनुभवी सांसदों को शामिल किया गया है, जो विदेश नीति के मोर्चे पर भारत की एकजुटता का परिचय देंगे। इन समूहों में रवि शंकर प्रसाद, पी. चिदंबरम, अखिलेश यादव, प्रो. राम गोपाल यादव, अभिषेक बनर्जी, डॉ. शशि थरूर, और सुप्रिया सुले जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हैं। इनके अलावा अनुराग ठाकुर, हेमा मालिनी, असदुद्दीन ओवैसी, कनिमोझी करुणानिधि और डेरेक ओ’ब्रायन जैसे विभिन्न विचारधाराओं के नेता भी इस पहल का हिस्सा बने हैं, जो विभिन्न देशों के साथ भारत के संबंधों को संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करेंगे।
संसदीय मैत्री समूहों का जाल दुनिया के सभी महत्वपूर्ण कोनों तक फैलाया गया है। इसमें अमेरिका, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जापान और जर्मनी जैसे विकसित देशों के साथ-साथ सऊदी अरब, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान जैसे रणनीतिक साझेदार भी शामिल हैं। पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव के साथ-साथ यूरोपीय संसद, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील के साथ भी विशेष समूह बनाए गए हैं। इस विविधता का लक्ष्य भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर विधायी सहयोग को बढ़ावा देना है।
मैत्री समूहों के गठन के पीछे की सोच केवल औपचारिक मुलाकातें नहीं, बल्कि गहरी समझ विकसित करना है। इन समूहों के माध्यम से भारतीय सांसद अपने विदेशी समकक्षों से सीधे संवाद कर सकेंगे। वे एक-दूसरे के संसदीय अनुभवों, विधायी प्रक्रियाओं और सामाजिक नीतियों से सीखेंगे। नियमित संपर्क के माध्यम से देशों के बीच ‘आपसी विश्वास’ (Mutual Trust) बढ़ेगा। इसके अलावा, व्यापार, अत्याधुनिक तकनीक, जलवायु परिवर्तन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे विषयों पर भी चर्चा होगी, जिससे द्विपक्षीय संबंधों को जमीनी स्तर पर मजबूती मिलेगी।
उल्लेखनीय है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न देशों में बहुदलीय शिष्टमंडल भेजकर दुनिया को यह संदेश दिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के हितों के मामले में पूरा भारत एक है। अलग-अलग विचारधाराओं के नेताओं का एक साथ विदेश जाना भारत की ‘एकता में अनेकता’ की शक्ति को दर्शाता है। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा 60 से अधिक देशों के साथ मैत्री समूहों का वर्तमान गठन उसी विजन की अगली कड़ी है। यह कदम सुनिश्चित करेगा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की आवाज न केवल प्रभावी हो, बल्कि उसमें पूरी भारतीय संसद का प्रतिनिधित्व दिखे।
आज की दुनिया में जब आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और वैश्विक स्वास्थ्य संकट जैसी चुनौतियां बढ़ रही हैं, तब संसदों के बीच सहयोग और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ये मैत्री समूह सांसदों को एक ऐसा मंच प्रदान करेंगे जहाँ वे वैश्विक मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण विकसित कर सकें। लोकसभा की यह पहल न केवल संसदीय कूटनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेगी, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के भारत के चिरंतन सिद्धांत को भी वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रासंगिक बनाएगी।
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