Prayagraj Magh Mela
Prayagraj Magh Mela: प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक नए कानूनी मोड़ पर पहुँच गया है। पिछले 36 घंटों से पालकी पर बैठकर धरना दे रहे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने एक कड़ा नोटिस जारी किया है। इस नोटिस में प्रशासन ने सीधे तौर पर उनके ‘शंकराचार्य’ होने के दावे पर सवाल उठाए हैं। मेला प्राधिकरण ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है जब स्वामी जी को पालकी यात्रा से रोके जाने के बाद क्षेत्र में धार्मिक और राजनीतिक माहौल पहले से ही तनावपूर्ण बना हुआ है।
मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष द्वारा जारी इस नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का विस्तृत हवाला दिया गया है। नोटिस में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के बीच ज्योतिषपीठ के पद को लेकर विवाद अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। प्रशासन ने दलील दी है कि अपील संख्या 3011/2020 में अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। जब तक अदालत पट्टाभिषेक या उत्तराधिकार के मामले में कोई स्पष्ट आदेश पारित नहीं कर देती, तब तक कोई भी धर्माचार्य खुद को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित नहीं कर सकता।
प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपना पक्ष रखने के लिए 24 घंटे का समय दिया है। नोटिस में उनसे पूछा गया है कि जब मामला कोर्ट में विचाराधीन है, तो वे अपने नाम के सम्मुख ‘शंकराचार्य’ शब्द का प्रयोग कैसे कर रहे हैं? प्रशासन ने उनके शिविर में लगे उन बोर्डों की तस्वीरें भी अटैच की हैं, जिनमें उन्हें ‘ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य’ प्रदर्शित किया गया है। नोटिस के अनुसार, इस तरह का प्रचार-प्रसार करना और स्वयं को शंकराचार्य के रूप में सुशोभित करना सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना और अवमानना की श्रेणी में आता है।
उधर, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने संकल्प पर अडिग हैं। वे रविवार रात से ही अपने शिविर के बाहर फुटपाथ पर पालकी पर बैठे हुए हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि उन्होंने अन्न के साथ-साथ जल का भी त्याग कर दिया है। स्वामी जी का कहना है कि प्रशासन ने परंपराओं को तोड़कर उनके धार्मिक अधिकारों का हनन किया है। हालांकि, अब नोटिस मिलने के बाद उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि वह उन्हें वर्तमान स्थिति में आधिकारिक रूप से शंकराचार्य स्वीकार नहीं करता है, जिससे यह लड़ाई अब पूरी तरह से वैधानिक और पद की गरिमा के इर्द-गिर्द सिमट गई है।
प्रयागराज मेला प्राधिकरण के इस कदम ने अखाड़ों और साधु-संतों के बीच चर्चा गर्म कर दी है। एक तरफ जहाँ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अनुयायी इसे सनातन धर्म के शीर्ष पद का अपमान बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन इसे अदालती आदेशों के पालन की कानूनी मजबूरी बता रहा है। 24 घंटे की समय सीमा समाप्त होने के बाद यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तो प्राधिकरण शिविर से बोर्ड हटाने या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई भी कर सकता है। फिलहाल, प्रयागराज की धरती पर धर्म, कानून और परंपराओं के बीच एक बड़ा टकराव देखने को मिल रहा है।
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