नहीं रहे कंप्यूटर साइंस के 'पितामह' प्रो. राजारमन।
Prof Rajaraman Death:भारत में कंप्यूटर विज्ञान शिक्षा की नींव रखने वाले और तकनीकी क्रांति के जनक कहे जाने वाले प्रोफेसर वैद्येश्वरन राजारमन का शनिवार को निधन हो गया। उन्होंने टाटानगर स्थित अपने घर पर अंतिम सांस ली। वे 91 वर्ष के थे और बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे।
प्रो. राजारमन को भारत में कंप्यूटर विज्ञान शिक्षा के पितामह के रूप में जाना जाता है। उनका योगदान न केवल शिक्षण और शोध तक सीमित था, बल्कि उन्होंने देश में आधुनिक तकनीकी शिक्षा के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। उनके छात्रों में ऐसे नाम शामिल हैं जिन्होंने भारतीय आईटी उद्योग को विश्व पटल पर स्थापित किया — इनमें इंफोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायण मूर्ति और टीसीएस के पहले सीईओ फकीर चंद कोहली प्रमुख हैं।
प्रो. राजारमन ने 1965 में आईआईटी कानपुर में भारत का पहला औपचारिक कंप्यूटर साइंस एकेडमिक प्रोग्राम शुरू किया। यह कदम भारतीय तकनीकी शिक्षा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। उसी समय उन्होंने छात्रों को कंप्यूटर तकनीक और प्रोग्रामिंग के प्रति प्रेरित किया, जब देश में कंप्यूटर शिक्षा की कल्पना भी नई थी।
उनकी दृष्टि और समर्पण ने आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाया। नारायण मूर्ति ने उन्हें याद करते हुए कहा कि “वह हर छात्र के सच्चे मार्गदर्शक थे, जिन्होंने हमें न केवल तकनीक सिखाई बल्कि सोचने का तरीका भी सिखाया।”
1982 से 1994 तक प्रो. राजारमन भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में सुपरकंप्यूटर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर (SERC) के अध्यक्ष रहे। यहां उन्होंने भारत में सुपरकंप्यूटिंग और समानांतर कंप्यूटिंग (Parallel Computing) क्षमताओं को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई।इसके अलावा, उन्होंने 1987 में प्रधानमंत्री की विज्ञान सलाहकार परिषद द्वारा गठित एक समिति की अध्यक्षता की, जिसने देश में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में कई नीतिगत निर्णयों को दिशा दी।
प्रो. राजारमन को देश ने उनके असाधारण योगदान के लिए कई सम्मान दिए। उन्हें 1976 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार और 1998 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। इन सम्मानों ने उनके जीवनभर की सेवाओं और भारत में तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को अमर कर दिया।
1933 में जन्मे प्रो. राजारमन ने अपने छह दशक लंबे करियर में भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाई। उनके द्वारा लिखी गई कंप्यूटर विज्ञान पर आधारित किताबें आज भी कई विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।
उनका जाना भारतीय तकनीकी शिक्षा जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है, लेकिन उनके द्वारा रखी गई नींव और शिक्षण की परंपरा आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।
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