Tara Kishkindha : रामायण की कथा में भगवान राम के वनवास के दौरान अनेक ऐसे पात्र सामने आते हैं, जिनकी भूमिका कथा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण रही। इन्हीं पात्रों में वानरराज बाली की पत्नी तारा का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। जब रावण माता सीता का हरण कर लंका ले गया, तब भगवान राम और लक्ष्मण उनकी तलाश में वन-वन भटक रहे थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात सुग्रीव से हुई और आगे चलकर बाली से जुड़ी घटनाओं ने रामायण की कथा में नया मोड़ ला दिया।
किष्किंधा की महारानी थीं तारा
तारा को किष्किंधा के राजा बाली की पत्नी और वहां की महारानी बताया गया है। वह केवल राजपरिवार का हिस्सा ही नहीं थीं, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और राजनीतिक समझ के लिए भी प्रसिद्ध थीं। तारा बाली के पुत्र अंगद की माता थीं। धार्मिक और पौराणिक कथाओं में उनके जन्म और वंश को लेकर अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। कुछ कथाओं में उन्हें देवगुरु बृहस्पति की पुत्री बताया गया है, जबकि अन्य परंपराओं में उनका संबंध वानर वैद्य सुषेण से जोड़ा जाता है।
समुद्र मंथन से जुड़ी है तारा के जन्म की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तारा का जन्म समुद्र मंथन के दौरान हुआ था। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया, तब अनेक दिव्य वस्तुओं और रत्नों के साथ अप्सराओं का भी प्राकट्य हुआ। इन्हीं दिव्य अप्सराओं में तारा का नाम भी लिया जाता है। कुछ धार्मिक परंपराओं में तारा को पंचकन्याओं में शामिल किया गया है। यही वजह है कि रामायण की कथा में उनका चरित्र विशेष धार्मिक महत्व रखता है।
तारा के रूप पर मोहित हुए बाली और सुषेण
कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय तारा के प्रकट होने पर उनकी सुंदरता देखकर बाली और सुषेण दोनों उनसे विवाह करना चाहते थे। तारा को लेकर दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगा और स्थिति संघर्ष तक पहुंचने लगी। मामला गंभीर होता देख भगवान विष्णु ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने दोनों को तारा के पास जाकर अलग-अलग दिशाओं में खड़े होने का निर्देश दिया।
भगवान विष्णु ने बताया विवाह का निर्णय
भगवान विष्णु के निर्देश पर बाली तारा के दाहिनी ओर जाकर खड़े हुए, जबकि सुषेण उनके बाईं ओर खड़े हुए। इसके बाद विष्णु ने तत्कालीन धार्मिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि कन्या के दाहिनी ओर खड़ा व्यक्ति उसका भावी पति माना जाता है, जबकि बाईं ओर खड़ा व्यक्ति कन्यादान करने वाले पिता का स्थान दर्शाता है। इस आधार पर बाली को तारा का पति माना गया। इसके बाद तारा और बाली का विवाह हुआ और तारा किष्किंधा की महारानी बनीं।
अंगद की माता और बुद्धिमान रानी थीं तारा
विवाह के बाद तारा ने किष्किंधा के राजपरिवार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह बाली के पुत्र अंगद की माता बनीं। रामायण की विभिन्न कथाओं में तारा को बुद्धिमान और परिस्थितियों को समझने वाली महिला के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह केवल बाली की पत्नी नहीं थीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में उसे सही सलाह देने वाली प्रमुख पात्र भी थीं।
सुग्रीव के खिलाफ युद्ध से पहले दी थी चेतावनी
जब सुग्रीव ने बाली को दोबारा युद्ध के लिए चुनौती दी, तब तारा ने परिस्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उन्हें आशंका थी कि पहले पराजित हो चुके सुग्रीव का अचानक इतना आत्मविश्वास दिखाना किसी शक्तिशाली सहयोगी के मिलने का संकेत हो सकता है। तारा ने बाली को सावधानी बरतने और बिना पूरी जानकारी के युद्ध के लिए बाहर नहीं जाने की सलाह दी।
तारा की दूरदर्शिता बनी कथा का अहम हिस्सा
तारा की यह चेतावनी उनके चरित्र की राजनीतिक समझ और दूरदर्शिता को दर्शाती है। हालांकि बाली ने उनकी सलाह को स्वीकार नहीं किया और सुग्रीव से युद्ध करने चला गया। आगे चलकर भगवान राम ने सुग्रीव की सहायता करते हुए बाली का वध किया। इस घटना के बाद भी तारा का चरित्र रामायण में करुणा, बुद्धिमत्ता और विवेक के प्रतीक के रूप में सामने आता है।
अलग-अलग परंपराओं में मिलती हैं कथाएं
तारा के जन्म, परिवार और विवाह को लेकर अलग-अलग रामायण परंपराओं तथा पौराणिक ग्रंथों में कुछ भिन्न विवरण मिलते हैं। इसलिए समुद्र मंथन से उनके जन्म और बाली-सुषेण से जुड़े विवाह प्रसंग को धार्मिक मान्यता और लोककथाओं के संदर्भ में देखा जाता है। बावजूद इसके, रामायण की कथा में तारा का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है और उनका चरित्र नारी बुद्धिमत्ता तथा दूरदर्शिता का उल्लेखनीय उदाहरण माना जाता है।
Read More : Vande Mataram Row: ‘बिना टेलीप्रॉम्प्टर पूरा वंदे मातरम् गाकर दिखाएं’, संजय राउत ने PM मोदी को दी चुनौती