Rahul Gandhi OBC : दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में शुक्रवार को आयोजित ‘भागीदारी न्याय सम्मेलन’ में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक साहसिक और अप्रत्याशित स्वीकारोक्ति करते हुए कहा कि उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन के पहले 21 वर्षों में ओबीसी समुदाय की पीड़ा और मुद्दों को नहीं समझा, जो एक बड़ी राजनीतिक चूक रही।
उन्होंने कहा, “मैंने पहले आवश्यक गति से काम नहीं किया, यह मेरी गलती थी, लेकिन अब मैं दोगुनी तेजी से इस दिशा में काम करूंगा।” यह बयान ऐसे वक्त पर आया है जब कांग्रेस ‘इंडिया गठबंधन’ के साथ मिलकर सामाजिक न्याय और जातीय गणना की मांग को राष्ट्रीय बहस का विषय बना रही है।
राहुल गांधी ने स्वीकार किया कि यदि उन्होंने पहले ओबीसी समुदाय की समस्याओं को ठीक से समझा होता, तो वे यूपीए सरकार के दौरान जातीय जनगणना अवश्य कराते। यह आत्मस्वीकृति ऐसे वक्त पर आई है जब देश में जातीय जनगणना को लेकर बहस तेज हो चुकी है और कांग्रेस शासित राज्य तेलंगाना पहले ही यह सर्वेक्षण पूरा कर चुका है।
राहुल गांधी का यह बयान यह भी दर्शाता है कि कांग्रेस अब जातीय जनगणना को सिर्फ मांग नहीं बल्कि अपनी चुनावी रणनीति का केंद्रीय मुद्दा बना चुकी है।
राहुल गांधी की यह स्वीकारोक्ति इसलिए भी खास है क्योंकि बिहार में आगामी कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार में पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़ा वर्ग की संयुक्त जनसंख्या 63 फीसदी है — एक ऐसा वर्ग जो चुनावी परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है।
पिछले छह महीनों में राहुल गांधी ने बिहार के पांच दौरे किए हैं और हाल ही में उन्होंने बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह को हटाकर दलित समुदाय के राजेश राम को पार्टी की कमान सौंपी है। यह स्पष्ट संकेत है कि कांग्रेस अब दलितों के साथ-साथ पिछड़े वर्गों को भी अपने कोर वोटबैंक के रूप में देख रही है।
बिहार सरकार द्वारा कराई गई जातीय गणना के अनुसार, राज्य की 63 फीसदी आबादी ओबीसी और ईबीसी वर्ग से संबंधित है। इनमें 27.12% ओबीसी और 36.01% अत्यंत पिछड़ा वर्ग हैं। इसके अलावा अनुसूचित जाति 19.65% और अनुसूचित जनजाति 1.68% है।
धार्मिक आधार पर देखें तो राज्य में 82% हिंदू, 17.70% मुसलमान, 0.05% ईसाई और अन्य धर्मों के लोग हैं। यह जातीय और धार्मिक समीकरण यह तय करता है कि बिहार की राजनीति में पिछड़ा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक ओमप्रकाश अश्क के मुताबिक, राहुल गांधी का अब तक का फोकस दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय पर केंद्रित था। वे आंबेडकर, आरक्षण और संविधान की रक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे।
लेकिन अब वह सामाजिक न्याय की दिशा में एक व्यापक रणनीति के तहत पिछड़े वर्गों को भी अपने एजेंडे में शामिल कर रहे हैं। राजगीर में हुए ‘संविधान सुरक्षा सम्मेलन’ में उन्होंने केंद्र सरकार पर आरक्षण और संवैधानिक अधिकारों पर हमले का आरोप लगाया था और दशरथ मांझी के परिवार से मिलकर सामाजिक प्रतीकों को भी साधने की कोशिश की।
ओबीसी पर बढ़ता राहुल गांधी का फोकस इंडिया गठबंधन के अंदर भी खींचतान पैदा कर सकता है। राजद और वामपंथी दलों का पारंपरिक वोटबैंक भी ओबीसी और ईबीसी वर्ग रहा है। खासकर राजद के संस्थापक लालू प्रसाद यादव ने बिहार में सामाजिक न्याय की अवधारणा को जमीन पर उतारा था।
ऐसे में कांग्रेस का यह नया रुख एक ओर उसे नए वोटरों से जोड़ सकता है, तो दूसरी ओर सहयोगी दलों के साथ तालमेल में चुनौती भी बन सकता है। लेकिन राहुल गांधी का यह कदम केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखेगा।
भारतीय राजनीति में अपनी गलती सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना एक दुर्लभ घटना है। राहुल गांधी का यह बयान उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करता है जो अपनी गलतियों को स्वीकार करने और उनसे सीखने का साहस रखता है।
कांग्रेस के अंदर भी यह चर्चा हो रही है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी अपनी गलती स्वीकार करेंगे? गांधी परिवार से आने वाला कोई बड़ा नेता जब खुद को दोषी मानता है, तो वह एक नैतिक उदाहरण स्थापित करता है।
राहुल गांधी की यह स्वीकारोक्ति ऐसे वक्त पर आई है जब कांग्रेस का ओबीसी वोटबैंक लगातार कमजोर होता गया है। आंकड़ों के अनुसार, 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 25% ओबीसी वोट मिले थे, जो 2024 तक घटकर केवल 18% रह गए।
इसके उलट भाजपा ने इसी वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। 1999 में भाजपा को 23% ओबीसी समर्थन प्राप्त था, जो 2024 में 44% तक पहुंच गया। यानी भाजपा ने सवर्णों के साथ-साथ ओबीसी और अन्य वंचित वर्गों को भी अपनी राजनीति में शामिल कर लिया है।
कांग्रेस अब इसी सामाजिक समीकरण में सेंध लगाने की योजना बना रही है।
राहुल गांधी का बयान कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं, बल्कि कांग्रेस की एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस पहले ही तेलंगाना में जातीय सर्वेक्षण करवा चुकी है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, जो स्वयं ओबीसी समुदाय से आते हैं, वहां भी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं।
कांग्रेस ने ओबीसी सशक्तीकरण के लिए एक विशेष प्रकोष्ठ का गठन किया है, जो इस वर्ग की जरूरतों और मांगों को नीतिगत स्तर पर पार्टी के एजेंडे में शामिल करेगा।
राहुल गांधी का यह बयान उन्हें केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि एक वैचारिक और नैतिक नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश भी है। वे यह संदेश देना चाहते हैं कि अगर उन्होंने अतीत में गलती की है तो वह उसे सुधारने को तैयार हैं।
यह छवि खासकर युवा और जागरूक मतदाताओं के बीच उन्हें एक जिम्मेदार राजनेता के रूप में प्रस्तुत करती है, जो सत्ता की राजनीति से आगे बढ़कर सामाजिक सुधार और न्याय की दिशा में काम करना चाहता है।
राहुल गांधी की ओबीसी को लेकर सार्वजनिक स्वीकारोक्ति और कांग्रेस की रणनीतिक तैयारियां यह साफ संकेत देती हैं कि पार्टी अब अपनी पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर नए सामाजिक समीकरण गढ़ना चाहती है।
जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय, आरक्षण और दलित-पिछड़ा सशक्तीकरण जैसे मुद्दे कांग्रेस की राजनीतिक दिशा को नई दिशा देने की कोशिश हैं। राहुल गांधी का यह ‘दांव’ सिर्फ बिहार विधानसभा चुनाव को नहीं, बल्कि 2029 के आम चुनाव तक की राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
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