IDBI Bank Privatization: आईडीबीआई बैंक के निजीकरण को लेकर देश में राजनीतिक और कर्मचारी संगठनों का विरोध तेज होता दिखाई दे रहा है। केंद्र सरकार की ओर से बैंक की बहुलांश हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने की मंजूरी दिए जाने के बाद अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सांसद ने बैंक कर्मचारियों के समर्थन में खड़े होने की बात कही है। इस मुद्दे पर बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों का संयुक्त मंच भी लगातार विरोध दर्ज करा रहा है।

राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर साधा निशाना
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर आईडीबीआई बैंक की बिक्री को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस शासनकाल में देश के उद्योगों को मजबूत बनाने और आर्थिक विकास को गति देने के उद्देश्य से आईडीबीआई बैंक की स्थापना की गई थी। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में पहले बोली लगाई गई और उसके बाद कीमत तय की गई।

उन्होंने अपने पोस्ट में कांग्रेस और भाजपा के शासनकाल की तुलना करते हुए कहा कि कांग्रेस के समय बैंक बनाए जाते थे, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में बैंकों को बेचा जा रहा है। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि वह आईडीबीआई बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ खड़े हैं।
कर्मचारियों के मंच ने सौदे के मूल्यांकन पर उठाए सवाल
इससे पहले गुरुवार को आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के विरोध में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में अधिकारियों और कर्मचारियों के संयुक्त मंच के संयोजक देवीदास तुलजापुरकर ने प्रस्तावित सौदे पर गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में बाजार में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। ऐसे माहौल में किसी बड़े वित्तीय संस्थान की हिस्सेदारी बेचने से पहले पूरी सावधानी बरतना आवश्यक है।
तुलजापुरकर के मुताबिक, सौदे में बैंक की संपत्तियों, संस्थागत क्षमताओं, ग्राहक संबंधों, भविष्य की संभावित कमाई और रणनीतिक महत्व का उचित मूल्यांकन नहीं होने की आशंका है। उन्होंने पारदर्शी मूल्यांकन और व्यापक सार्वजनिक चर्चा की मांग भी उठाई।

53 हजार करोड़ रुपये में बेची जाएगी 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी
केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर को आईडीबीआई बैंक की कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग 53,000 करोड़ रुपये में फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने की मंजूरी दी थी। प्रस्तावित सौदे में सरकार की 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी की कीमत करीब 26,620 करोड़ रुपये और भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी की कीमत लगभग 26,440 करोड़ रुपये बताई गई है।
इस सौदे को भारतीय रिजर्व बैंक की नियामकीय मंजूरी मिलना बाकी है। मंजूरी मिलने की स्थिति में चालू वित्त वर्ष के अंत तक प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद जताई गई है।
मूल्यांकन और खरीदार की वित्तीय स्थिति सार्वजनिक करने की मांग
कर्मचारी मंच ने सरकार से मांग की है कि बैंक की संपत्तियों के मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए। इसमें अचल संपत्तियों, अन्य परिसंपत्तियों और बिक्री मूल्य निर्धारित करने के आधार की जानकारी शामिल होनी चाहिए। मंच का कहना है कि जनता को यह भरोसा मिलना चाहिए कि राष्ट्रीय महत्व की संपत्ति का हस्तांतरण उचित कीमत पर किया जा रहा है।
इसके अलावा प्रस्तावित खरीदार की वित्तीय स्थिति, स्वामित्व संरचना और नियामकीय रिकॉर्ड की भी पारदर्शी जांच करने की मांग की गई है। मंच के अनुसार, किसी बड़े भारतीय बैंक का नियंत्रण निजी हाथों में सौंपने के मामले में केवल नियामकीय मंजूरी पर्याप्त नहीं हो सकती।
51 प्रतिशत सरकारी हिस्सेदारी के पुराने आश्वासन का मुद्दा
संयुक्त मंच ने बैंक को बैंकिंग कंपनी में बदलने के दौरान संसद में दिए गए तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह के आश्वासन का भी उल्लेख किया। मंच के मुताबिक, उस समय सरकार की हिस्सेदारी कम से कम 51 प्रतिशत बनाए रखने की बात कही गई थी। अब सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रस्तावित निजीकरण उस आश्वासन के अनुरूप कैसे है।
कर्मचारी संगठनों ने यह भी चिंता जताई कि निजीकरण से आरक्षण, रोजगार सुरक्षा, वंचित समुदायों के अवसर, वित्तीय समावेश और विकासोन्मुख ऋण व्यवस्था प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
आईडीबीआई बैंक में 19,108 कर्मचारी कार्यरत
आईडीबीआई बैंक में कुल 19,108 कर्मचारी काम करते हैं। इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लगभग 9,500 कर्मचारी शामिल हैं। इसके अलावा बैंक में 6,911 महिलाएं और 884 दिव्यांग कर्मचारी कार्यरत हैं।
सरकार के पास बैंक की 45.48 प्रतिशत और एलआईसी के पास 49.24 प्रतिशत हिस्सेदारी है। प्रस्तावित सौदे के बाद बैंक के स्वामित्व और नियंत्रण में बड़ा बदलाव होने की संभावना है। ऐसे में राहुल गांधी के विरोध, कर्मचारी संगठनों की मांगों और सरकार के निजीकरण संबंधी फैसले को लेकर बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।

