Raigarh Bulldozer Action
Raigarh Bulldozer Action: छत्तीसगढ़ के रायगढ़ नगर निगम की ‘अतिक्रमण हटाओ’ मुहिम एक बार फिर गहरे विवादों में घिर गई है। मामला वार्ड क्रमांक 38, देवारपारा का है, जहाँ पट्टा धारक महेंद्र यादव की निजी भूमि पर बनी बाउंड्रीवाल को निगम के अमले ने जमींदोज कर दिया। आरोप है कि यह पूरी कार्रवाई बिना किसी पूर्व सूचना या लिखित नोटिस के अंजाम दी गई। जिस समय निगम का बुलडोजर महेंद्र यादव के घर पहुँचा, वह स्वयं वहां मौजूद नहीं थे। घर पर केवल उनकी पत्नी और 8 साल की मासूम बेटी थी। निगम कर्मियों ने संवेदनशीलता को ताक पर रखकर सीधे दीवार तोड़ना शुरू कर दिया, जिससे स्थानीय निवासी आक्रोशित हो उठे।
जैसे ही इस मनमानी कार्रवाई की खबर मोहल्ले में फैली, पूर्व पार्षद मुरारी भट्ट के नेतृत्व में बड़ी संख्या में नागरिक और पीड़ित परिवार के समर्थक मौके पर इकट्ठा हो गए। देखते ही देखते माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया और लोगों ने निगम की कार्यप्रणाली के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। स्थिति को बिगड़ता देख पुलिस बल को बुलाना पड़ा। पुलिस ने उत्तेजित भीड़ को समझाने का प्रयास किया, लेकिन स्थानीय लोगों के भारी विरोध और आक्रोश के चलते नगर निगम की टीम को अपनी कार्रवाई बीच में ही छोड़कर बैरंग वापस लौटना पड़ा।
पीड़ित महेंद्र यादव ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उन्होंने समाज हित में पहले ही सड़क चौड़ीकरण के लिए 4 फीट और नाली निर्माण के लिए 2 फीट जमीन स्वेच्छा से छोड़ दी थी। उन्होंने कहा, “यह हमारी निजी पट्टा भूमि है। अगर निगम को कोई आपत्ति थी, तो उन्हें पहले नोटिस देना चाहिए था। बिना बताए दीवार तोड़ना सरासर अन्याय है।” अब पीड़ित परिवार ने इस नुकसान के लिए उचित न्याय और मुआवजे की मांग की है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जो परिवार विकास के लिए अपनी जमीन दे रहा है, उसके साथ ऐसा व्यवहार निंदनीय है।
इस विवाद ने तब राजनीतिक मोड़ ले लिया जब पूर्व पार्षद और वार्ड वासियों ने निगम पर ‘पिक एंड चूज’ (चयनात्मक) कार्रवाई का आरोप लगाया। आरोप है कि जहाँ एक ओर गरीब पट्टा धारक की दीवार ढहा दी गई, वहीं चर्च के पास स्थित नजूल भूमि पर बनी उन दुकानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो कथित तौर पर महापौर जीवर्धन चौहान से जुड़ी हैं। स्थानीय लोगों ने सवाल उठाया कि क्या नियम केवल आम जनता के लिए हैं? लोगों ने महापौर के इस कथित अवैध कब्जे की शिकायत भी दर्ज कराई है, लेकिन अभी तक उस पर कोई प्रभावी जांच शुरू नहीं हुई है।
जब इस पूरे मामले पर महापौर जीवर्धन चौहान से उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उन्होंने बताया कि उनकी दुकानें 30 वर्षों से संचालित हो रही हैं। हालांकि, जब उनसे यह पूछा गया कि क्या वह जमीन उनके नाम पर पट्टे में है या नजूल की जमीन पर कब्जा है, तो उन्होंने चुप्पी साध ली। महापौर की इस खामोशी ने संदेह को और गहरा कर दिया है। सवाल यह उठता है कि यदि शहर में 40-50 साल पुराने गरीबों के आशियाने तोड़े जा सकते हैं, तो सत्ता के रसूख वाले अवैध निर्माणों पर निगम की टीम जांच करने की हिम्मत जुटा पाएगी या पद और प्रभाव के आगे नतमस्तक हो जाएगी?
पूर्व पार्षद मुरारी भट्ट ने इस कार्रवाई को स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण करार दिया है। उन्होंने कहा कि कानून की नजर में हर नागरिक बराबर होना चाहिए। एक तरफ निजी संपत्ति पर बुलडोजर चलाया जा रहा है और दूसरी तरफ सरकारी (नजूल) जमीन पर बने व्यापारिक प्रतिष्ठानों को संरक्षण दिया जा रहा है। रायगढ़ की जनता अब प्रशासन से यह जवाब मांग रही है कि क्या नगर निगम अपनी खोई हुई साख वापस पाने के लिए निष्पक्ष जांच करेगा या फिर यह ‘बुलडोजर न्याय’ केवल कमजोर वर्गों तक ही सीमित रहेगा?
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