राजनीति

Rajasthan Congress: राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी, अरावली मुद्दे पर पायलट खेमे की ‘मात्र’ 2.5 किमी की रैली

Rajasthan Congress: अरावली पर्वतमाला को बचाने और वहां हो रहे अवैध खनन के विरोध में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेता लगातार बयानबाजी कर रहे हैं। इसी कड़ी में सचिन पायलट खेमे के करीबी माने जाने वाले एनएसयूआई (NSUI) के प्रदेश अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने एक पैदल रैली निकालने का निर्णय लिया है। शुक्रवार, 26 दिसंबर को आयोजित होने वाली इस रैली में खुद पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट शामिल होंगे। पायलट ने स्वयं सोशल मीडिया के जरिए इस रैली में अपनी उपस्थिति की पुष्टि की है, जिससे उनके समर्थकों में भारी उत्साह है।

Rajasthan Congress: दूरी को लेकर उठे सवाल: 100 किमी बनाम ढाई किमी

राजनीतिक गलियारों में इस रैली की दूरी को लेकर काफी चर्चा हो रही है। गौर करने वाली बात यह है कि जब प्रदेश में कांग्रेस की ही सरकार थी, तब सचिन पायलट ने पेपर लीक मामले में अपनी ही सरकार के खिलाफ अजमेर से जयपुर तक 100 किलोमीटर से अधिक लंबी जन संघर्ष यात्रा निकाली थी। लेकिन अब, जब प्रदेश में भाजपा की सरकार है और मुद्दा अरावली जैसा गंभीर और राष्ट्रीय है, तब पायलट गुट मात्र ढाई किलोमीटर लंबी पैदल रैली निकाल रहा है। आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल एक ‘खानापूर्ति’ और रस्म अदायगी करार दे रहे हैं।

Rajasthan Congress: अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट: मुद्दे की क्रेडिट वॉर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस कम दूरी की रैली के पीछे गहरी राजनीतिक वजहें हैं। अरावली खनन के मुद्दे पर सबसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था और इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। ऐसा कहा जा रहा है कि पायलट खेमा इस मुद्दे को बहुत अधिक हवा नहीं देना चाहता क्योंकि इसकी शुरुआत गहलोत ने की थी। यही कारण है कि एनएसयूआई की इस रैली को महज एक सांकेतिक विरोध तक सीमित रखा गया है, ताकि जनता के बीच उपस्थिति भी दर्ज हो जाए और गहलोत के अभियान को अधिक माइलेज भी न मिले।

सोशल मीडिया पर समर्थकों के बीच तीखी बयानबाजी

NSUI की इस प्रस्तावित रैली को लेकर सोशल मीडिया पर भी सियासत गरमा गई है। गहलोत और पायलट दोनों ही धड़ों के समर्थक एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। एक तरफ पायलट समर्थक इसे युवाओं की आवाज बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ विरोधी खेमा ढाई किलोमीटर की दूरी का मजाक उड़ाते हुए इसे ‘दिखावा’ कह रहा है। राजस्थान की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब किसी मुद्दे पर कांग्रेस के दोनों गुट एक साथ खड़े होने के बजाय अपनी अलग राह चलते दिखाई दे रहे हैं।

क्या विपक्ष के तौर पर प्रभावी हो पाएगी कांग्रेस?

विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस की यह आंतरिक फूट भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो रही है। जानकारों का कहना है कि अगर कांग्रेस को अरावली जैसे बड़े मुद्दे पर सरकार को घेरना है, तो उसे एकजुटता दिखानी होगी। फिलहाल, शुक्रवार को होने वाली इस रैली में कौन-कौन से विधायक और दिग्गज नेता शामिल होते हैं, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं। क्या यह ढाई किलोमीटर की यात्रा जनता के बीच कोई बड़ा संदेश दे पाएगी या यह केवल आपसी गुटबाजी की एक और भेंट चढ़ जाएगी, यह बड़ा सवाल है।

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