ADR Report : राज्यसभा के 226 सांसदों की संपत्ति ₹26,047 करोड़, 31 अरबपति, तेलंगाना के सांसद सबसे अमीर

ADR Report : भारतीय संसद का उच्च सदन, यानी राज्यसभा, देश के नीति-निर्माताओं का केंद्र है, लेकिन हाल ही में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा जारी एक विस्तृत रिपोर्ट ने इन सांसदों की आर्थिक स्थिति और उनके आपराधिक इतिहास को लेकर कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। ADR ने राज्यसभा के कुल 233 में से 226 वर्तमान सांसदों के हलफनामों का गहन विश्लेषण किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, राज्यसभा के 90 फीसदी से अधिक सांसद करोड़पति हैं, जबकि मात्र 4 सांसद ऐसे हैं जिनकी कुल संपत्ति 20 लाख रुपये से कम है। यह आंकड़े देश के जन प्रतिनिधियों की समृद्धि और आर्थिक आधार को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन 226 सांसदों की कुल संपत्ति का योग 26,047 करोड़ रुपये है, और प्रति सांसद औसत संपत्ति लगभग 115.25 करोड़ रुपये बैठती है।

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राज्यसभा में अरबपतियों का बढ़ता वर्चस्व

आर्थिक संपन्नता के मामले में राज्यसभा का स्तर अत्यंत ऊंचा है। रिपोर्ट के अनुसार, सदन में 14 फीसदी सांसद ‘अरबपति’ की श्रेणी में आते हैं। इन सांसदों के पास 100 करोड़ रुपये से अधिक की घोषित संपत्ति है। यदि दलों के आधार पर देखें, तो अरबपति सांसदों में बीजेपी के 7, कांग्रेस के 6, वाईएसआरसीपी के 2, टीडीपी के 2, बीआरएस के 2 और एनसीपी के 2 सांसद शामिल हैं। वहीं, संपत्ति के बंटवारे पर गौर करें तो 100 सांसदों के पास 10 करोड़ से अधिक, 41 सांसदों के पास 5 से 10 करोड़ रुपये, 66 सांसदों के पास 1 से 5 करोड़ रुपये और 15 सांसदों के पास 20 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच की संपत्ति है।

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सबसे अमीर और सबसे गरीब सांसद: आर्थिक विषमता की तस्वीर

संपत्ति के मामले में क्षेत्रीय प्रभाव भी स्पष्ट है। तेलंगाना के राज्यसभा सांसदों का दबदबा सबसे अधिक है, जहां 7 में से 4 यानी 57% सांसद अरबपति हैं। तेलंगाना के सभी सातों सांसदों की सम्मिलित संपत्ति 8,310 करोड़ रुपये है। सबसे अमीर सांसद का खिताब भी तेलंगाना के ही बीआरएस सांसद डॉ. बंदी पार्थ सराधी के नाम है, जिनकी संपत्ति 5,300 करोड़ रुपये से अधिक है। सूची में दूसरे स्थान पर पंजाब से बीजेपी सांसद राजिंदर गुप्ता (5,053 करोड़ रुपये) और तीसरे स्थान पर कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी (2,558 करोड़ रुपये) हैं। इसके विपरीत, सबसे कम संपत्ति वाले सांसदों में पंजाब से AAP सांसद संत बलबीर सिंह (3.79 लाख रुपये), सीपीआई(एम) के एए रहीम (11.62 लाख रुपये) और मध्य प्रदेश से बीजेपी सांसद सुमित्रा वाल्मीक (17.85 लाख रुपये) शामिल हैं।

गंभीर आपराधिक मामलों का साया

आर्थिक आंकड़ों के अलावा, ADR की यह रिपोर्ट सांसदों के आपराधिक इतिहास पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है। 226 में से 69 सांसदों (31%) ने अपने हलफनामों में खुद पर आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी है। इनमें से 36 सांसदों (16%) पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें 5 साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। रिपोर्ट के मुताबिक, सदन में एक सांसद पर हत्या का मामला है, जबकि 4 सांसद हत्या के प्रयास और 4 सांसद महिलाओं के खिलाफ अत्याचार जैसे जघन्य अपराधों के आरोपी हैं। आपराधिक छवि वाले सांसदों की संख्या विभिन्न राजनीतिक दलों में समान रूप से चिंताजनक है, जो राजनीति के अपराधीकरण की समस्या को रेखांकित करती है।

देनदारी और वित्तीय जटिलताएं

संपत्ति की चकाचौंध के बीच सांसदों पर भारी देनदारी (कर्ज) भी एक बड़ा मुद्दा है। झारखंड से निर्दलीय सांसद परिमल नाथवानी के पास 755 करोड़ से अधिक की संपत्ति होने के बावजूद उन पर 256 करोड़ रुपये का कर्ज है। नाथवानी हाल ही में एनडीए के समर्थन और क्रॉस-वोटिंग के जरिए चुनकर आए हैं। देनदारी के मामले में दूसरे स्थान पर आंध्र प्रदेश से टीडीपी सांसद बी. रामा कृष्णा हैं, जिनकी 672 करोड़ की संपत्ति के बदले 200 करोड़ से अधिक की देनदारी है। वहीं, समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन भी इस सूची में शामिल हैं; उनके पास 1,578 करोड़ की संपत्ति है, लेकिन उन पर 149 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज भी है।

राजनीतिक दलों पर आपराधिक मामलों का दबाव

अपराध और राजनीति के इस घालमेल को यदि राजनीतिक दलों के चश्मे से देखें, तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। टीडीपी के 75% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि आरजेडी के 67% और समाजवादी पार्टी के 50% सांसद इस श्रेणी में आते हैं। गंभीर आपराधिक मामलों की बात करें तो सीपीआई(एम) के 67%, बीआरएस के 33% और आम आदमी पार्टी (AAP) के 33% सांसदों पर गंभीर मामले लंबित हैं। यह आंकड़े देश की सर्वोच्च विधायी संस्था में स्वच्छ छवि के उम्मीदवारों की आवश्यकता और चुनावों में सुधार की मांग को और बल प्रदान करते हैं। यह रिपोर्ट न केवल मतदाताओं के लिए एक आईना है, बल्कि भविष्य के सुधारों के लिए एक आवश्यक दस्तावेज भी है, जिस पर संसद और चुनाव आयोग को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

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Chandan Das

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