Ramu Wolf Boy
Ramu Wolf Boy: यह कहानी साल 1954 की है, जब लखनऊ रेलवे स्टेशन पर एक 9 साल का लड़का मिला जो भूख से कांप रहा था और उसकी शारीरिक बनावट बेहद डरावनी थी। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार वह वेटिंग रूम में मिला, तो कुछ का कहना था कि वह ट्रेन के खाली डिब्बे में लावारिस हालत में पड़ा था। उस समय के उत्तर प्रदेश के बलरामपुर अस्पताल में उसे भर्ती कराया गया। वह लड़का न तो बोल पाता था और न ही सीधा खड़ा हो सकता था। वह केवल गुर्राता था और इंसानों को देखकर हिंसक हो जाता था। जल्द ही यह खबर आग की तरह फैली और बलरामपुर अस्पताल डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों और राजनेताओं के लिए एक प्रयोगशाला और आकर्षण का केंद्र बन गया।
दुनिया के लिए वह एक अद्भुत कौतूहल था। उसका नाम ‘रामू’ रखा गया। उसकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द टाइम्स’ और ‘न्यूजवीक’ ने उस पर विस्तृत रिपोर्ट्स प्रकाशित कीं। रामू के दांत बाहर निकले हुए थे, नाखून मुड़े हुए और हाथ-पैर किसी जानवर के पंजे जैसे हो गए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक पुरानी स्टोरी के मुताबिक, वह शुरुआत में केवल कच्चा मांस ही खाता था। 16 जनवरी, 1954 को उसे आधिकारिक तौर पर ‘वुल्फ बॉय’ यानी भेड़िया बालक कहा जाने लगा। चिकित्सा जांच में पाया गया कि वह ‘बोवाइन प्लूरिसी’ नामक संक्रमण से ग्रसित था, जो आमतौर पर जानवरों के संपर्क में रहने से होता है।
रामू के अस्तित्व को लेकर विद्वानों में दो गुट बन गए थे। डॉ. डीएन शर्मा और डॉ. बीएस अग्रवाल ने 14 वर्षों तक उसका उपचार किया और उनका दृढ़ विश्वास था कि उसे भेड़ियों ने पाला था। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन के सर फिलिप मैनसन-बेहर ने भी पुष्टि की थी कि वह निश्चित रूप से जानवरों के बीच रहा था। हालांकि, मशहूर शिकारी और लेखक जिम कॉर्बेट इस सिद्धांत से असहमत थे। कॉर्बेट का मानना था कि रामू एक ऐसी मां की संतान था जिसने समाज के डर से उसे छिपकर पाला और बाद में जब वह उसे खिलाने में असमर्थ हुई, तो उसे स्टेशन पर छोड़ दिया।
डॉक्टरों ने कॉर्बेट के तर्कों का जवाब देने के लिए पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की दो लड़कियों, अमला और कमला का उदाहरण दिया, जिन्हें 1920 के दशक में भेड़ियों की मांद से निकाला गया था। रामू 1968 में 27 वर्ष की आयु में इस दुनिया से विदा हो गया। डॉक्टरों का कहना था कि वह अपनी उम्र से अधिक जी चुका था, क्योंकि जंगली जानवरों की औसत आयु लगभग इतनी ही होती है। रामू कभी पूरी तरह से इंसान नहीं बन पाया और उसका रहस्य उसके साथ ही दफन हो गया।
रामू इकलौता ऐसा मामला नहीं था। इतिहास में ऐसे कई बच्चे दर्ज हैं जो मानवीय समाज से दूर जानवरों के बीच पले-बढ़े:
इवान मिशुकोव (रूस): 4 साल की उम्र में घर से भागा और 2 साल तक आवारा कुत्तों के झुंड के साथ रहा।
जॉन सेबुनिया (युगांडा): 1991 में पाया गया यह बच्चा लगभग 2 साल तक बंदरों के साथ जंगल में रहा।
दीना सानिचार (भारत): 1867 में बुलंदशहर के पास एक भेड़िये की मांद से मिला। कहा जाता है कि मोगली का किरदार इसी से प्रेरित था।
ट्रायन कैलडार (रोमानिया): 2002 में मिला यह बच्चा सालों तक कुत्तों के साथ सर्वाइव कर रहा था।
ओक्साना मलाया (यूक्रेन): शराबी माता-पिता की उपेक्षा के कारण 5 साल तक कुत्तों के बाड़े में रही और उन्हीं की तरह भौंकना सीख लिया।
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