Rehabilitation Land Game : सरगुजा जिले में पुनर्वास पट्टों की जमीन के क्रय-विक्रय और पंजीयन पर कलेक्टर अजीत वसंत द्वारा आगामी आदेश तक रोक लगाए जाने के बाद वर्षों से फल-फूल रहे जमीन कारोबार को बड़ा झटका लगा है। विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए आवंटित भूमि धीरे-धीरे भू-माफियाओं, दलालों और प्रभावशाली लोगों के निवेश का माध्यम बन चुकी थी। प्रशासन के इस फैसले को न केवल जमीन कारोबार पर बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है, बल्कि उन अनियमितताओं और विवादों पर भी अंकुश लगाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिन्होंने पुनर्वास योजना की मूल भावना को ही पीछे छोड़ दिया था।

पुनर्वास की जमीन से खड़ा हुआ करोड़ों का कारोबार
पुनर्वास पट्टे की जमीन की बिक्री के लिए कलेक्टर न्यायालय से अनुमति लेना अनिवार्य है। नियमों के अनुसार विवाह, गंभीर बीमारी, आर्थिक संकट अथवा अन्य विशेष परिस्थितियों में अनुमति दी जा सकती है। लेकिन वर्षों तक इन प्रविधानों का दुरुपयोग होने के आरोप लगते रहे हैं। जमीन बिक्री की अनुमति प्राप्त करने के लिए कई मामलों में झूठे दस्तावेज और प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए गए। कैंसर सहित गंभीर बीमारियों से पीड़ित होने तथा उपचार के लिए धन की आवश्यकता बताकर अनुमति लेने के अनेक मामले सामने आए। विवाह और पारिवारिक संकट का हवाला देकर भी अनुमति प्राप्त की जाती रही। बाद में यही जमीन बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर कारोबारियों और प्रभावशाली लोगों के हाथों पहुंचती रही।

अनुमति की आड़ में चलती रही खरीद-बिक्री की व्यवस्था
पुनर्वास पट्टे की जमीन लंबे समय से राजस्व विभाग के लिए विवादों का विषय रही है। जमीन बिक्री की अनुमति से लेकर नामांतरण और अन्य राजस्व प्रक्रियाओं में अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम रही है कि अनुमति की प्रक्रिया ने दलालों और जमीन कारोबारियों का एक समानांतर नेटवर्क खड़ा कर दिया था। सभी ने मोटी कमाई के लिए नियम प्रक्रियाओं को ताक पर रख दिया। कई मामलों में तहसीलदार के प्रतिवेदन के आधार पर अनुमति दी गई तो कई बार कलेक्टर स्तर पर अनुमति नहीं मिलने पर अपील और पुनरीक्षण की प्रक्रिया के माध्यम से वरिष्ठ राजस्व न्यायालयों से स्वीकृति प्राप्त कर ली गई। प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि पहुंच और प्रभाव रखने वाले लोग नियमों की बाधाओं को पार कर जमीन की खरीद-बिक्री कराने में सफल होते रहे।
झूठे दस्तावेजों से हासिल होती रही बिक्री की मंजूरी
पुनर्वास पट्टे की जमीन केवल आर्थिक लाभ का माध्यम ही नहीं बनी, बल्कि जिले में अनेक सामाजिक और कानूनी विवादों की भी वजह रही। जमीन को लेकर मारपीट, कब्जे के विवाद, धोखाधड़ी और प्रताड़ना के अनेक मामले सामने आए। कुछ मामलों में एक ही जमीन का कई लोगों से एग्रीमेंट कर दिया गया, जबकि रजिस्ट्री किसी अन्य व्यक्ति के नाम कर दी गई।
ऐसे भी मामले सामने आए जिनमें कम रकबे की जमीन का अनुबंध कर बाद में अधिक रकबे की रजिस्ट्री करा ली गई। कई विवाद आज भी न्यायालयों में लंबित हैं। पुलिस थानों से लेकर राजस्व न्यायालयों और दीवानी अदालतों तक पुनर्वास पट्टे की जमीन से जुड़े प्रकरणों की लंबी सूची मौजूद है। जमीन विवादों के कारण आत्महत्या और गंभीर आपराधिक घटनाओं की शिकायतें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं।
राजस्व तंत्र, दलाल और जमीन कारोबारी सवालों के घेरे में
सरगुजा में पुनर्वास पट्टे की जमीनों के वर्तमान स्वरूप का अध्ययन किया जाए तो बड़ी संख्या में ऐसी जमीनें मिलेंगी जिन पर अब प्रभावशाली लोगों के फार्म हाउस, आलीशान मकान, बगीचे, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और विवाह भवन विकसित हो चुके हैं। जिन उद्देश्यों के लिए विस्थापित परिवारों को जमीन आवंटित की गई थी, वे उद्देश्य काफी हद तक पीछे छूट गए और जमीन बाजार का हिस्सा बनती चली गई। इतना ही नहीं राजस्व विभाग के अधिकारी, कर्मचारियों ने भी पुनर्वास पट्टों की जमीन खरीद-बिक्री कर बड़ी संपत्ति खड़ी कर ली है।
विधानसभा में भी गूंज चुका है पुनर्वास जमीन का मुद्दा
पुनर्वास पट्टे की जमीन का मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक बहस का विषय भी रहा है। विधानसभा में भी इस संबंध में सवाल उठाए गए। विपक्ष और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा लगातार आरोप लगाए जाते रहे कि विस्थापितों के नाम पर दी गई जमीनों का लाभ वास्तविक हितग्राहियों के बजाय भू-माफियाओं और प्रभावशाली वर्गों को मिल रहा है। कलेक्टर अजीत वसंत द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि पुनर्वास पट्टे से प्राप्त भूमि को छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 165 (7)(ख) के तहत क्रय-विक्रय की अनुमति से संबंधित प्रकरणों में कानूनी स्थिति को लेकर सचिव, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग रायपुर से मार्गदर्शन मांगा गया है। इस संबंध में राज्य शासन से मार्गदर्शन प्राप्त होने तक पुनर्वास पट्टे से प्राप्त भूमि के क्रय-विक्रय और उसके पंजीयन पर रोक लगा दी गई है।
क्या अब पुनर्वास भूमि अपने मूल उद्देश्य तक लौट पाएगी ?
सरगुजा जिले में यह आदेश केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि पुनर्वास पट्टे की जमीन के नाम पर वर्षों से चल रहे उस पूरे तंत्र पर सवाल है, जिसने विस्थापितों के पुनर्वास की योजना को जमीन कारोबार में बदल दिया। अब निगाहें इस बात पर हैं कि शासन से मार्गदर्शन मिलने के बाद आगे की नीति क्या होगी और क्या वास्तव में पुनर्वास पट्टे की जमीन को उसके मूल उद्देश्य से जोड़ने की दिशा में कोई ठोस पहल हो पाएगी।











