RSS Vijayadashami Utsav 2025: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने गुरुवार को अपने स्थापना दिवस यानी विजयादशमी के अवसर पर शताब्दी समारोह बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया। इस महत्वपूर्ण अवसर पर संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने सबसे पहले RSS के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद भागवत ने परंपरागत शस्त्र पूजन किया, जो संघ की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है। इस खास आयोजन में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. रामनाथ कोविंद मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे और उन्होंने भी डॉ. हेडगेवार को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

शताब्दी विजयादशमी उत्सव: नागपुर में भव्य आयोजन
यह कार्यक्रम नागपुर के ऐतिहासिक रेशम बाग मैदान में आयोजित किया गया, जिसमें लगभग 21,000 स्वयंसेवकों ने भाग लिया। संघ के राष्ट्रीय स्वयंसेवक देशभर से इस कार्यक्रम में पहुंचे और विजयादशमी के पावन दिन को यादगार बनाया। संघ की 83,000 से अधिक शाखाओं में भी यह उत्सव बड़े पैमाने पर मनाया गया।

संघ की स्थापना 1925 में इसी दिन डॉ. हेडगेवार ने की थी, इसलिए विजयादशमी को संघ अपना स्थापना दिवस भी मानता है। इस अवसर पर संघ का यह शताब्दी समारोह राष्ट्रीय एकता, सेवा और संगठन की शक्ति का प्रतीक बना।
अंतरराष्ट्रीय मेहमानों की उपस्थिति से बढ़ा समारोह का गौरव
इस आयोजन की खास बात रही कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी उत्सव में विदेशी मेहमानों को भी आमंत्रित किया। घाना, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, थाईलैंड, यूके और यूएसए जैसे देशों से प्रतिनिधि इस समारोह में शामिल हुए। इससे यह उत्सव एक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप भी प्राप्त हुआ।
घटना स्थल पर लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलित, दक्षिण भारत के डेक्कन समूह के केवी कार्तिक, और बजाज समूह के संजीव बजाज जैसे प्रमुख व्यक्तित्वों की भी मौजूदगी रही। इससे यह कार्यक्रम सामाजिक, आर्थिक और सैन्य क्षेत्र के प्रतिनिधियों को जोड़ने वाला अवसर भी बना।

मोहन भागवत का संबोधन
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने समारोह के दौरान एक विशेष भाषण भी दिया। उन्होंने कहा कि RSS की स्थापना का उद्देश्य देश के युवाओं में राष्ट्र प्रेम, सेवा भावना और अनुशासन को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि संघ ने पिछले सौ वर्षों में भारतीय समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और आने वाले समय में भी संघ देश की प्रगति के लिए काम करता रहेगा।
भागवत ने युवाओं को भी संबोधित करते हुए कहा कि देश की सेवा और संघ के आदर्शों को अपनाना आज के दौर में बहुत जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संघ एक ऐसा संगठन है जो बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के समाज की सेवा करता है।
विजयादशमी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
विजयादशमी, जो दशहरा के रूप में भी जाना जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। RSS द्वारा इसे स्थापना दिवस के रूप में मनाना संगठन की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ा हुआ है। शस्त्र पूजन के माध्यम से स्वयंसेवक अपने भीतर ऊर्जा, साहस और समर्पण की भावना का संचार करते हैं।
संघ की भूमिका और भविष्य की चुनौतियां
RSS आज देश के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है, जिसकी शाखाएं पूरे भारत में फैली हैं। संघ ने शिक्षा, सेवा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार जैसे क्षेत्रों में निरंतर कार्य किया है। शताब्दी उत्सव के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि संघ भविष्य में भी राष्ट्र निर्माण के लिए अपनी भूमिका को और मजबूत करेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी विजयादशमी उत्सव न केवल एक भव्य आयोजन था बल्कि यह देशभक्ति, संगठन शक्ति और सामाजिक समरसता का भी परिचायक था। मोहन भागवत और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में यह कार्यक्रम भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद की भावना को प्रबल करने वाला रहा। विदेशी मेहमानों की उपस्थिति ने इस आयोजन को वैश्विक स्तर पर भी मान्यता दी है।
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