Lal Bahadur Shastri leadership: लाल बहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्री पद पर कार्यकाल भले ही मात्र 19 महीने का रहा हो, लेकिन इस छोटे से समय में उन्होंने देश पर एक अमिट छाप छोड़ी। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके संघर्ष और सादगी भरे नेतृत्व ने उन्हें भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट स्थान दिलाया। 1962 में चीन से मिली हार के बाद देश के टूटे मनोबल को उन्होंने 1965 के पाकिस्तान युद्ध में जीत के जरिए पुनः मजबूती दी। इस दौरान शास्त्री ने भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए बड़े कदम उठाए, जिनकी गूंज आज भी सुनाई देती है।

प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर सशक्त उपस्थिति
2 जून 1964 को शास्त्री ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और तुरंत यह संदेश दे दिया कि वे किसी के प्रभाव में नहीं आएंगे। उन्होंने मंत्रियों की सूची खुद बनाई और सीधे राष्ट्रपति को भेजी। कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज और अन्य नेताओं की भूमिका के बावजूद, उन्होंने अपनी निर्णय क्षमता का परिचय दिया। इंदिरा गांधी को सूचना प्रसारण मंत्रालय देकर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे किसी की वर्चस्वता स्वीकार नहीं करेंगे।

भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम – CBI का गठन
शास्त्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार की शिकायतों में तेजी से वृद्धि हुई थी। गृह मंत्रालय के अधीन स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट की जांच सीमा केंद्र सरकार के अधिकारियों तक सीमित थी। शास्त्री ने इस विभाग का नाम बदलकर सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) कर दिया और इसकी जांच को व्यापक किया। इससे सरकार के ठेकों और भ्रष्टाचार पर कड़ी नजर रखने की शुरुआत हुई।
बड़े नेताओं को भी नहीं छोड़ा
शास्त्री ने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों को गंभीरता से लिया। एस.आर.दास आयोग की रिपोर्ट के बाद उन्होंने कैरो से इस्तीफा लेने को कहा, जो अंततः मजबूर होकर मुख्यमंत्री पद से हटे। शास्त्री का यह कदम उनके भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति को दर्शाता है।
वित्त मंत्री की छुट्टी और परिवार में भी अनुशासन
शास्त्री ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख अपनाया और वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णामचारी को उनके विरुद्ध आरोपों के कारण इस्तीफा देना पड़ा। इसके अलावा, उन्होंने अपने बड़े बेटे हरि कृष्ण शास्त्री की व्यापारिक गतिविधियों में मिली शिकायतों के बाद उसे प्रधानमंत्री आवास से बाहर का रास्ता दिखा दिया। यह दिखाता है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ बिना किसी पक्षपात के सख्त थे, यहां तक कि परिवार में भी।

अमेरिका को करारा जवाब
1965 के युद्ध के दौरान शास्त्री ने अमेरिका के दबाव को ठुकराते हुए पाकिस्तान के पक्ष में अमेरिकी रुख का विरोध किया। अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन के आमंत्रण को उन्होंने अस्वीकार कर दिया और सोवियत संघ की यात्रा की। इससे यह स्पष्ट हुआ कि शास्त्री देशहित में अंतरराष्ट्रीय दबावों के आगे झुकने को तैयार नहीं थे।
उपवास के जरिए देशवासियों को एकजुट किया
अमेरिका द्वारा खाद्यान्न आपूर्ति रोकने के बाद शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास करने की अपील की। उन्होंने स्वयं से यह पहल शुरू की और इस आंदोलन ने पूरे देश को आत्मनिर्भरता की ओर प्रेरित किया। इस दौरान उन्होंने ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया, जो आज भी देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
हरित क्रांति और श्वेत क्रांति के लिए प्रयास
शास्त्री ने खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए हरित क्रांति को बढ़ावा दिया। दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में श्वेत क्रांति को भी उन्होंने समर्थन दिया। ये पहलें भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधारने में मील के पत्थर साबित हुईं।
लाल बहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्री कार्यकाल कम जरूर था, लेकिन उनकी सादगी, दृढ़ता और भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदमों ने भारतीय राजनीति को नया आयाम दिया। उनकी नीतियों और नेतृत्व ने भारत को न केवल आंतरिक संकटों से उबारा बल्कि देश की अंतरराष्ट्रीय छवि भी मजबूत की। उनके आदर्श आज भी देश के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।











