Samrat Choudhary Journey
Samrat Choudhary Journey : बिहार की राजनीति ने एक करवट ली है और सत्ता की कमान अब सम्राट चौधरी के हाथों में आ गई है। सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर राज्य में एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत की है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता के रूप में उभरे सम्राट को यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे दशकों का संघर्ष और विवादों से भरा सफर रहा है। सम्राट के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बिहार में सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल गया है, जिससे कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है।
सम्राट चौधरी का राजनीति से नाता जन्मजात रहा है। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार के उन दिग्गज नेताओं में गिने जाते हैं जिनका दबदबा कई दशकों तक राज्य की राजनीति पर रहा। शकुनी चौधरी एक मंझे हुए समाजवादी नेता थे और लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी सहयोगियों में से एक माने जाते थे। सम्राट ने अपने पिता के साये में ही राजनीति के दांव-पेंच सीखे। हालांकि, समय के साथ शकुनी चौधरी ने अपनी राहें बदलीं और नीतीश कुमार के साथ हो लिए। पिता की इसी सियासी विरासत को सम्राट ने न केवल संभाला, बल्कि उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाकर एक नई ऊँचाई प्रदान की।
यह एक दिलचस्प विरोधाभास है कि जिस राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और लालू परिवार के सम्राट चौधरी आज सबसे प्रखर विरोधी माने जाते हैं, उनकी राजनीति का ‘क, ख, ग’ उसी आंगन में शुरू हुआ था। सम्राट ने अपने राजनीतिक जीवन का आगाज आरजेडी से किया था। 16 नवंबर 1968 को जन्मे सम्राट ने कम उम्र में ही पार्टी के भीतर अपनी पैठ बना ली थी। लालू प्रसाद यादव की छात्रछाया में रहने के कारण उन्हें जमीनी राजनीति का गहरा अनुभव हुआ, जो आज उनके भाजपा के कार्यकाल में काफी काम आ रहा है।
सम्राट चौधरी के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड दर्ज है जो शायद ही किसी और नेता के पास हो। वह महज 19 साल की उम्र में राबड़ी देवी सरकार में कृषि राज्य मंत्री बन गए थे। लेकिन यह उपलब्धि उनके लिए संकट का कारण भी बनी। उनकी उम्र को लेकर उस समय इतना बड़ा विवाद खड़ा हुआ कि उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त करना पड़ा। यह आरोप लगा कि मंत्री बनने के लिए जो न्यूनतम आयु (25 वर्ष) आवश्यक है, सम्राट उससे काफी छोटे थे। विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, जिसके बाद राज्यपाल ने उन्हें पद से हटाने का आदेश दिया।
1999 में तत्कालीन राज्यपाल सूरजभान ने सम्राट चौधरी को बिहार कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया था। जांच में पाया गया कि उनके स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट और अन्य दस्तावेजों में उम्र को लेकर भारी विसंगतियां थीं। किसी दस्तावेज में उनकी उम्र 26 साल बताई गई थी, तो कहीं 31 साल। इतना ही नहीं, 1995 के एक मामले में उन्होंने खुद को नाबालिग बताया था। राज्यपाल ने न केवल उन्हें हटाया, बल्कि धोखाधड़ी और गलत हलफनामा दायर करने के आरोप में मामला दर्ज करने का भी आदेश दिया था। यह उनके करियर का सबसे निचला स्तर था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री बनकर एक ऐसा मिथक तोड़ा है जिसे अब तक केवल जननायक कर्पूरी ठाकुर ही कर पाए थे। बिहार के इतिहास में कर्पूरी ठाकुर एकमात्र ऐसे नेता थे जो पहले उपमुख्यमंत्री रहे और बाद में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे। सुशील मोदी, तेजस्वी यादव और विजय कुमार सिन्हा जैसे दिग्गज नेता डिप्टी सीएम तो रहे, लेकिन सीधे सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुँच सके। सम्राट चौधरी अब इस विशिष्ट सूची में शामिल होने वाले दूसरे नेता बन गए हैं, जो उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत का प्रमाण है।
सम्राट का राजनीतिक सफर आरजेडी से शुरू होकर जेडीयू और फिर बीजेपी तक पहुँचा है। 2014 में जब जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने, तब सम्राट चौधरी उनकी सरकार में भी मंत्री थे। हालांकि, बाद में उन्होंने महसूस किया कि उनकी विचारधारा भारतीय जनता पार्टी के साथ अधिक मेल खाती है। बीजेपी में शामिल होने के बाद वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने और अपनी आक्रामक कार्यशैली से शीर्ष नेतृत्व का भरोसा जीता। उन्होंने नीतीश कुमार के विरोध में ‘मुरेठा’ (पगड़ी) बांधने की कसम खाकर काफी सुर्खियां बटोरी थीं, जो उनके दृढ़ निश्चय को दर्शाता है।
सफलता के साथ विवादों ने भी सम्राट का पीछा नहीं छोड़ा। उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर विपक्षी दलों, विशेषकर जेडीयू और प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकारों ने बार-बार सवाल उठाए। 2025 के चुनावी माहौल के बीच उनकी डिग्री और हलफनामों को लेकर काफी बहस हुई। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान ‘एफिडेविट’ को ‘हाफिडेबिट’ कहने पर भी उनका काफी मजाक उड़ाया गया, लेकिन सम्राट ने इन सब बातों को दरकिनार करते हुए अपने संगठन विस्तार पर ध्यान केंद्रित रखा।
आज सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में एक चुनौतीपूर्ण राह पर हैं। उनके सामने न केवल राज्य के विकास का एजेंडा है, बल्कि अपनी उस छवि को भी बरकरार रखने की चुनौती है जिसने उन्हें यहाँ तक पहुँचाया है। एक मंत्री के रूप में बर्खास्त होने से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक का उनका यह सफर भारतीय राजनीति की अनिश्चितताओं और संभावनाओं की एक अद्भुत कहानी है। अब देखना यह होगा कि सम्राट की यह पारी बिहार की जनता के लिए कितनी फलदायी साबित होती है।
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