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SC Stray Dogs: आवारा कुत्तों का मुद्दा, सुप्रीम कोर्ट में चूहों और बिल्लियों का जिक्र

SC Stray Dogs: देश भर में बढ़ती आवारा कुत्तों की समस्या और उनसे होने वाले हादसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का दौर जारी है। जस्टिस की पीठ ने इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायालय का उद्देश्य किसी एक पक्ष को राहत देना नहीं, बल्कि एक ऐसा व्यावहारिक और संतुलित समाधान निकालना है जिससे आम जनता की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो और पशुओं के प्रति क्रूरता भी न हो। कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले से जुड़े सभी पक्षों—चाहे वे स्थानीय निकाय हों, नागरिक समूह हों या पशु प्रेमी—सभी के सुझावों को विस्तार से सुनेगा ताकि एक समावेशी नीति तैयार की जा सके।

डॉग लवर्स की दलील: पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने का खतरा

सुनवाई के दौरान पशु प्रेमियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी. यू. सिंह ने दलीलों का मोर्चा संभाला। उन्होंने पारिस्थितिक तंत्र (Ecological Balance) का हवाला देते हुए एक दिलचस्प तर्क पेश किया। सिंह ने कहा कि यदि शहरों से आवारा कुत्तों को पूरी तरह हटा दिया जाता है, तो इससे खाद्य श्रृंखला में असंतुलन पैदा होगा। उन्होंने तर्क दिया कि कुत्तों की अनुपस्थिति में चूहों और बंदरों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है, जो भविष्य में मानव बस्तियों के लिए नई और अधिक गंभीर बीमारियाँ या समस्याएं खड़ी कर सकते हैं।

कोर्ट की रोचक टिप्पणी: “चूहों के लिए बिल्लियाँ हैं”

जब अधिवक्ता सिंह ने कुत्तों के हटने से चूहों के बढ़ने की बात कही, तो अदालत कक्ष में माहौल थोड़ा हल्का हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मजाकिया लेकिन तार्किक लहजे में टिप्पणी की। बेंच ने मुस्कराते हुए कहा, “परंपरागत रूप से बिल्लियों को चूहों का दुश्मन माना जाता है। ऐसे में अगर चूहों की समस्या बढ़ती है, तो क्या समाधान के तौर पर बिल्लियों की संख्या बढ़ाना बेहतर नहीं होगा?” इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने यह संकेत देने की कोशिश की कि समस्या का समाधान जटिल तर्कों के बजाय सीधे और प्रभावी उपायों में ढूंढना चाहिए।

शेल्टर होम बनाम नसबंदी: संसाधनों के सही उपयोग पर बहस

वरिष्ठ वकील सी. यू. सिंह ने कुत्तों को शेल्टर होम में कैद करने के विचार का भी कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि कुत्तों को एक सीमित दायरे में बंद करने से उनमें तनाव बढ़ता है और वहां संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा कहीं ज्यादा होता है, जो अंततः सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को शेल्टर होम पर भारी भरकम खर्च करने के बजाय कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण (ABC Programme) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

बजट का प्रबंधन: कुत्तों के लिए घर या इंसानों के लिए?

सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण पहलू वित्तीय संसाधनों के आवंटन का भी उठा। दलील दी गई कि भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ अभी भी एक बड़ी आबादी के पास सिर छिपाने के लिए छत नहीं है, वहां सरकारी बजट का बड़ा हिस्सा कुत्तों के लिए भव्य शेल्टर होम बनाने में खर्च करना तार्किक नहीं लगता। पक्षकारों ने सुझाव दिया कि सरकार को बजट का उपयोग गरीबों के लिए घर बनाने जैसे जनकल्याणकारी कार्यों में करना चाहिए, जबकि कुत्तों की समस्या को वैज्ञानिक तरीके से आबादी नियंत्रित करके हल किया जाना चाहिए। कोर्ट अब इस मामले के सभी कानूनी और सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अगली सुनवाई में विस्तृत दिशा-निर्देश तय कर सकता है।

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