Sharm El-Sheikh Summit: मिस्र के शर्म अल शेख में सोमवार, 13 अक्टूबर को आयोजित शांति सम्मेलन में एक बार फिर विश्व राजनीति की निगाहें जमीं। इस सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच सौहार्दपूर्ण और तारीफों भरे पल देखने को मिले। शहबाज ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को रोकने में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की भूमिका अहम और प्रभावशाली रही। वहीं, ट्रंप ने भी अपने संबोधन में नेताओं को शांति की अहमियत समझाई।

यह सम्मेलन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण था कि ट्रंप ने गाजा शांति योजना प्रस्तावित की है और वे खुद इसके सह-आयोजक हैं। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सीसी भी इस सम्मेलन के सह-आयोजक बने हुए हैं। सम्मेलन के पहले, ट्रंप ने इज़रायली संसद में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की जमकर तारीफ की और हमास को हिंसा के खिलाफ कड़ी चेतावनी भी दी।

PM मोदी की कूटनीतिक रणनीति और भारत का प्रतिनिधित्व
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने खुद नहीं जाकर विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह को प्रतिनिधि भेजा। मोदी ने ‘X’ (पूर्व ट्विटर) पर गाजा में युद्धविराम और बंधकों की रिहाई का स्वागत करते हुए कहा, “दो वर्षों से अधिक समय से बंदी बनाए गए सभी बंधकों की रिहाई का स्वागत है। यह उनके परिवारों के साहस, राष्ट्रपति ट्रंप के अथक शांति प्रयासों और प्रधानमंत्री नेतन्याहू के दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।”
मगर, भारत के इस कदम को लेकर कई सियासी विश्लेषकों और पूर्व राजनयिकों ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ट्वीट करते हुए कहा कि यह “रणनीतिक संयम” है या “खोया हुआ अवसर।” उन्होंने कहा कि इतने बड़े सम्मेलन में भारत का कमतर स्तर का प्रतिनिधित्व उसकी कूटनीतिक महत्वाकांक्षा के विपरीत है और इस कदम से भारत की आवाज उस प्रभावशाली स्तर तक नहीं पहुंचेगी, जितनी होनी चाहिए थी।
सम्मेलन में शामिल अन्य प्रमुख नेता
इस शांति सम्मेलन में करीब 20 से अधिक देशों के नेता शामिल हुए। कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी, जिन्होंने ट्रंप के साथ मिलकर शांति प्रक्रिया शुरू की, फिलिस्तीनी प्राधिकरण के महमूद अब्बास, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस, अरब लीग के महासचिव अहमद अबूल ग़ैत और जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला द्वितीय जैसे दिग्गज शामिल रहे।
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी सम्मेलन में मौजूद थे। वहीं, इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस बार इस सम्मेलन में नहीं आए।
कूटनीति का आईना और भारत की रणनीति
शर्म अल शेख शांति सम्मेलन ने वैश्विक कूटनीति के कई रंग दिखाए। ट्रंप और शहबाज के बीच गरमाहट और तालमेल ने यह साफ कर दिया कि संघर्षरत देशों के बीच संवाद और शांति के लिए वैश्विक नेतृत्व कितना अहम है। वहीं, भारत की ओर से मोदी का प्रतिनिधि भेजना और मोदी की युद्धविराम का स्वागत, यह संकेत देता है कि भारत शांति प्रक्रिया को समर्थन देने के साथ-साथ अपनी कूटनीतिक रणनीति भी सटीक तरीके से चला रहा है।
हालांकि, भारत की इस रणनीति पर राजनीतिक हलकों में बहस जारी है कि क्या इतने महत्वपूर्ण वैश्विक मंच पर भारत को खुद सक्रिय रूप से मौजूद होना चाहिए था या नहीं। लेकिन एक बात तय है कि भारत ने अपने हितों को देखते हुए अपनी स्थिति बनाए रखी है और शांति के समर्थन में अपनी आवाज़ भी बुलंद की है।
Read More : Bihar Elections 2025: दल-बदल का दौर तेज, निष्ठा बनाम अवसरवाद की सियासत गर्माई











