Sheikh Hasina : बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और आवामी लीग की प्रमुख शेख हसीना के हालिया बयान ने नई दिल्ली से लेकर ढाका तक की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा कर दी है। हसीना ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि वह इसी साल बांग्लादेश वापस लौटेंगी। यह ऐलान ऐसे समय में आया है जब वह अगस्त 2024 में हुए तख्तापलट के बाद से भारत में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। 78 वर्षीय हसीना के खिलाफ बांग्लादेश की विभिन्न अदालतों में हत्या, भ्रष्टाचार और मानवता के खिलाफ अपराधों समेत कुल 663 मुकदमे दर्ज हैं। उन्हें एक मामले में मौत की सजा भी सुनाई जा चुकी है, जिसके कारण उनकी वापसी के ऐलान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कयासों का दौर शुरू हो गया है।

आवामी लीग का भविष्य और हसीना की वापसी की मजबूरी
शेख हसीना की वापसी का एक बड़ा कारण उनकी पार्टी ‘आवामी लीग’ का अस्तित्व बचाना है। उनके भारत आने के बाद से बांग्लादेश में पार्टी की गतिविधियां लगभग ठप पड़ गई हैं और पार्टी पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया है। पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व परिवर्तन का दबाव बढ़ रहा था। ऐसी आशंकाएं थीं कि यदि हसीना किसी अन्य नेता को कमान सौंपती हैं, तो पार्टी से उनके परिवार का प्रभाव हमेशा के लिए खत्म हो सकता है। अतीत में भी बीएनपी (BNP) की सत्ता के दौरान हसीना ने बांग्लादेश में रहकर ही संघर्ष किया है, शायद इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने दोबारा सक्रिय राजनीति में उतरने का साहस भरा फैसला लिया है।

बांग्लादेश में बिछ रही वापसी की नई राजनीतिक बिसात
हसीना की कथित वापसी को लेकर बांग्लादेश में कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखे जा रहे हैं, जो इस स्क्रिप्ट की ओर इशारा करते हैं:
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चुनाव आयोग का रुख: हाल ही में आयोग ने आवामी लीग के कार्यकर्ताओं को आगामी पंचायत चुनाव में निर्दलीय तौर पर लड़ने की सशर्त छूट दी है। इसे बीएनपी के नरम पड़ते रुख और राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
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जमात-ए-इस्लामी पर बढ़ता दबाव: रविवार, 28 जून को संसद में जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठी। बीएनपी के नेताओं का मानना है कि जमात का 1971 के मुद्दों पर माफी न मांगना उनके लोकतांत्रिक विरोधी रवैये को दर्शाता है।
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विपक्ष की भूमिका की तैयारी: जमात के सांसद एटीएम अजहर ने आरोप लगाया है कि यह सब एक मिलीभगत है, जिसके तहत आवामी लीग को एक कमजोर विपक्ष के रूप में पुनः स्थापित करने की कवायद की जा रही है।
कानूनी चुनौतियां: मौत की सजा और 663 मुकदमों का बोझ
शेख हसीना के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानूनी है। ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश’ के आंकड़ों के अनुसार, उनके विरुद्ध 453 हत्या के मामले दर्ज हैं। 2024 के जुलाई विद्रोह और उसके बाद 5 अगस्त को हुए तख्तापलट के दौरान हुई हिंसा के लिए उन्हें दोषी ठहराते हुए एक अदालत मौत की सजा भी सुना चुकी है। कुल मिलाकर उन्हें पांच अलग-अलग मामलों में सजा मिल चुकी है। ऐसे में कानूनी पेचीदगियों के बीच उनकी वापसी का रास्ता बेहद कठिन और जोखिम भरा नजर आ रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि बांग्लादेश की वर्तमान सरकार और वहां की न्यायपालिका उनकी वापसी पर क्या प्रतिक्रिया देती है।
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