Special Intensive Revision : एनडीए गठबंधन के भीतर ही अब चुनाव आयोग की ओर से चल रहे ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ को लेकर संशय उभरने लगे हैं। गठबंधन की प्रमुख सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी (TDP) ने इस अभियान पर सवाल उठाते हुए आयोग से सफाई मांगी है। टीडीपी का कहना है कि यह कदम कहीं नागरिकता सत्यापन की प्रक्रिया की ओर बढ़ता एक और ‘चुपचाप’ प्रयास तो नहीं है?
टीडीपी संसदीय दल के नेता लावु श्री कृष्ण देवरायलु ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर इस अभियान के उद्देश्य को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि “यह ज़रूरी है कि आयोग यह बताए कि यह विशेष गहन पुनरीक्षण केवल मतदाता सूची में त्रुटियों को दूर करने तक सीमित है या इसका मकसद नागरिकता सत्यापन से भी जुड़ा है।”उन्होंने दो टूक कहा कि अगर किसी मतदाता को नागरिकता सिद्ध करनी पड़े, तो उसे पूरा अवसर मिलना चाहिए और किसी को भी बिना ठोस सबूत के सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
टीडीपी का यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि वह एनडीए सरकार की भागीदार है। आमतौर पर एनडीए के भीतर विरोध के स्वर कम ही सुनाई देते हैं, लेकिन टीडीपी का यह पत्र बताता है कि गहन पुनरीक्षण को लेकर केवल विपक्ष ही नहीं, सत्ता के अपने साथी भी चिंतित हैं। पार्टी का यह पत्र एक ‘सावधानी भरा विरोध’ है, जो संकेत देता है कि बिहार में शुरू हुई यह प्रक्रिया अन्य राज्यों में भी राजनीतिक और सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकती है।
चुनाव आयोग ने इस अभियान की शुरुआत बिहार से की है और इसे “विशेष गहन पुनरीक्षण” नाम दिया है। आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य अवैध प्रवासियों और अयोग्य मतदाताओं को हटाना है ताकि सिर्फ योग्य भारतीय नागरिक ही मतदान कर सकें। चुनाव आयोग के अनुसार, यह अभ्यास कानूनन आवश्यक है और पारदर्शिता के साथ किया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद राजनीतिक दलों को आशंका है कि यह प्रक्रिया एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) जैसी नागरिकता से जुड़ी कवायद में बदल सकती है। टीएमसी समेत कई विपक्षी दल पहले ही इस अभियान को लेकर अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। तृणमूल कांग्रेस ने इसे “एनआरसी की छाया में किया जा रहा एक परोक्ष हमला” बताया है। टीएमसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया से गरीब, अल्पसंख्यक और वंचित वर्गों के वैध मतदाता भी सूची से बाहर हो सकते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि टीडीपी का पत्र एक सावधानीपूर्वक सियासी कदम है। इससे पार्टी न सिर्फ अपने जनाधार -विशेषकर आंध्र प्रदेश के संवेदनशील वर्गों को एक संदेश देना चाहती है, बल्कि यह भी दिखाना चाहती है कि वह केंद्र की हर नीति से आंख मूंदकर सहमत नहीं है। यह पत्र आने वाले दिनों में एनडीए के भीतर मतदाता नीति को लेकर गहराते विचार-विमर्श और संभावित असहमतियों की शुरुआत हो सकता है। ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ को लेकर जहां विपक्ष इसे ‘एनआरसी का लाइट वर्जन’ बता रहा है, वहीं अब एनडीए की सहयोगी टीडीपी का इस मुद्दे पर खुलकर सामने आना दर्शाता है कि मामला केवल प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन चुका है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग क्या स्पष्टीकरण देता है, और क्या यह प्रक्रिया आगे अन्य राज्यों में बिना विवाद के आगे बढ़ पाती है या इसमें और विरोध की आवाजें शामिल होती हैं।
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