SC on Hate Speech
SC on Hate Speech: देश में बढ़ती नफरती बयानबाजी (Hate Speech) की घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बेहद अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने राजनेताओं और उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि वे देश में भाईचारा बढ़ाने की दिशा में काम करें। अदालत ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक जीवन में बैठे व्यक्तियों का व्यवहार और उनकी भाषा संविधान के मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए। कोर्ट की यह नसीहत ऐसे समय में आई है जब चुनावी रैलियों और सोशल मीडिया पर तीखी बयानबाजी का दौर तेज हो गया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केवल कानून बनाकर हेट स्पीच को रोकना संभव नहीं है। इसके लिए सबसे पहले सोच में सुधार की आवश्यकता है, क्योंकि किसी भी भाषण से पहले मन में विचार पैदा होते हैं। बेंच ने कहा कि यदि विचार ही नफरत से भरे होंगे, तो शब्द भी जहरीले ही निकलेंगे। इसलिए, नेताओं को अपनी वैचारिक बुनियाद को आपसी सम्मान और भाईचारे पर आधारित करना चाहिए।
राजनीतिक दलों को संबोधित करते हुए CJI ने एक भावुक और गंभीर अपील की। उन्होंने कहा, “हम सभी दलों से यह अपेक्षा करते हैं कि आप संवैधानिक नैतिकता और मूल्यों का पालन करें। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि आप अलग-अलग वैचारिक सिद्धांतों के आधार पर चुनाव लड़ते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में एक-दूसरे के प्रति सम्मान नहीं खोना चाहिए।” अदालत ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को व्यक्तिगत दुश्मनी या सामुदायिक नफरत में नहीं बदलना चाहिए, क्योंकि जनता अपने नेताओं के आचरण से ही प्रेरणा लेती है।
यह पूरी सुनवाई नौ नागरिकों द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर आधारित थी। इस याचिका में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के हालिया बयानों और असम भाजपा द्वारा साझा किए गए एक वीडियो को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि वीडियो और भाषणों के जरिए एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है, जो सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरनाक है। याचिका में मांग की गई थी कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा नफरत फैलाने वाली बयानबाजी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को नए दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी करने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिका के स्वरूप पर आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका किसी एक व्यक्ति या विशेष पार्टी को केंद्रित करके दायर की गई लगती है, जो न्यायपालिका के निष्पक्ष दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं है। CJI ने याचिकाकर्ताओं से कहा, “हम आपके द्वारा उठाए गए मुद्दे की गंभीरता का सम्मान करते हैं, लेकिन आपकी याचिका से यह आभास नहीं होना चाहिए कि आप किसी विशेष व्यक्ति के खिलाफ हैं।” अदालत ने याचिका वापस लेने और एक ऐसी नई याचिका दायर करने का निर्देश दिया, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के संदर्भ में व्यापक दिशा-निर्देशों की मांग की गई हो।
सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि बोलने की आजादी (Freedom of Speech) असीमित नहीं है। विशेषकर तब, जब बोलने वाला व्यक्ति संविधान की शपथ लेकर किसी ऊंचे पद पर बैठा हो। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि शीर्ष अदालत की इस नसीहत का राजनीतिक गलियारों में कितना असर होता है और क्या आगामी चुनावों में भाषा की मर्यादा बनी रहती है।
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