Supreme Court Ruling : सुप्रीम कोर्ट ने धर्म के नाम पर वोट मांगने को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए भारतीय राजनीति के ‘धूसर’ यानी ग्रे ज़ोन की ओर इशारा किया है। हालांकि, अदालत ने AIMIM (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) पर प्रतिबंध की याचिका खारिज कर दी, लेकिन धर्म या जाति आधारित चुनाव प्रचार को लोकतंत्र के लिए खतरनाक करार दिया।
हाल ही में तिरुपति नरसिम्हा मुरारी नामक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि AIMIM धर्म के नाम पर वोट मांगती है। उनका आरोप था कि पार्टी इस्लामी शिक्षा के प्रसार की बात करती है और मुस्लिम समुदाय की एकता पर विशेष ज़ोर देती है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिकाकर्ता ने अपने तर्क में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक अभिराम सिंह बनाम सीडी कोमाच्ची मामले का हवाला दिया, जिसमें 2017 में कोर्ट ने साफ कहा था कि कोई भी उम्मीदवार धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट नहीं मांग सकता। इस निर्णय को आधार बनाते हुए याचिकाकर्ता ने AIMIM का पंजीकरण रद्द करने और पार्टी पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि AIMIM का संविधान भारत के संविधान के अनुरूप है और उसमें ऐसा कोई तत्व नहीं है जो असंवैधानिक हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा—चाहे धार्मिक हो या सांस्कृतिक—के प्रचार पर आपत्ति नहीं की जा सकती, जब तक कि वह संविधान के दायरे में है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अभिराम सिंह मामला व्यक्ति विशेष या उम्मीदवार की चुनावी आचरण पर लागू होता है, पूरे राजनीतिक दल पर नहीं। किसी एक नेता के बयान को आधार बनाकर पूरी पार्टी को अयोग्य ठहराना या पंजीकरण रद्द करना अनुचित होगा।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन महत्वपूर्ण संदेश जरूर दिया। पीठ ने कहा कि भारतीय राजनीति में धर्म और जाति आधारित प्रचार एक खतरनाक ट्रेंड बनता जा रहा है, जिससे लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कोर्ट ने कहा: “धर्म या जाति के नाम पर वोट मांगना भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हानिकारक है। यह राजनीति का एक ‘धूसर क्षेत्र’ है, जिस पर गंभीर सोच की आवश्यकता है।” व्यापक याचिका दायर करें, दलों के नाम से बचें।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह सुझाव भी दिया कि यदि उन्हें चुनावी प्रक्रिया में धार्मिक तत्वों के दखल से आपत्ति है, तो वे किसी विशेष पार्टी का नाम लिए बिना एक सामान्य रिट याचिका दायर करें। इससे अदालत को व्यापक दिशा-निर्देश या नीतिगत निर्देश देने का अवसर मिलेगा, जो किसी एक दल पर केंद्रित न होकर पूरे चुनावी परिदृश्य को प्रभावित कर सकता है। इस फैसले ने एक बार फिर चुनावों में धर्म और जाति के दुरुपयोग के खतरे की ओर ध्यान खींचा है।
सुप्रीम कोर्ट ने AIMIM के खिलाफ कार्रवाई से इनकार तो किया, लेकिन राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश दे दिया है—धार्मिक या सांप्रदायिक आधार पर वोट मांगना भारतीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह फैसला भविष्य में ऐसी याचिकाओं और राजनीति में धर्म के दखल को लेकर अहम नज़ीर बन सकता है।
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