SC on EC Appointment: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार, 14 मई 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। कोर्ट ने विशेष रूप से चयन समिति में कैबिनेट मंत्री की उपस्थिति पर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने टिप्पणी की कि वर्तमान पैनल, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री शामिल हैं, में संतुलन का अभाव है। कोर्ट ने सीधा सवाल किया कि यदि अंतिम निर्णय सरकार को ही लेना है, तो चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल कर ‘स्वतंत्रता का दिखावा’ करने की क्या आवश्यकता है?

प्रधानमंत्री और मंत्री का समीकरण: बहुमत पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत ही व्यावहारिक पहलू की ओर इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि एक कैबिनेट मंत्री कभी भी अपने प्रधानमंत्री के निर्णय या इच्छा के विरुद्ध जाने का साहस नहीं दिखा सकता। ऐसी स्थिति में, चयन समिति का कोई भी निर्णय हमेशा 2:1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में ही रहेगा। अदालत ने इसे ‘संरचित बहुमत’ करार दिया, जो चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने के लिए इस प्रक्रिया में वास्तविक पारदर्शिता की आवश्यकता है।
CBI निदेशक की तुलना: निष्पक्षता के दोहरे मापदंड पर सवाल
अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। कोर्ट ने पूछा कि यदि देश की कानून व्यवस्था संभालने वाली एजेंसी (CBI) के प्रमुख की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल हो सकते हैं, तो लोकतंत्र की नींव रखने वाले चुनाव आयोग के प्रमुख की नियुक्ति में वैसी ही स्वतंत्र प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जा सकती? जस्टिस दत्ता ने कहा कि स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना कानून व्यवस्था बनाए रखने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए यहाँ पारदर्शिता का स्तर और भी ऊंचा होना चाहिए।
स्वतंत्र सदस्य की आवश्यकता: कोर्ट का सरकार को सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि चयन समिति में तीसरे सदस्य के रूप में सरकार के किसी मंत्री के बजाय किसी पूरी तरह स्वतंत्र सदस्य को जगह मिलनी चाहिए। यह सुझाव इसलिए दिया गया ताकि समिति के भीतर कोई भी पक्ष दूसरे पर हावी न हो सके और नियुक्ति पूरी तरह योग्यता और निष्पक्षता के आधार पर हो। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट का मानना है कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब उसकी चयन प्रक्रिया में सरकार का सीधा हस्तक्षेप न दिखे।
RTI के सबूतों के आधार पर नियुक्तियों को चुनौती: एस.एन. शुक्ला की दलील
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एस.एन. शुक्ला ने न केवल नए कानून की वैधता को चुनौती दी, बल्कि वर्तमान में पदस्थ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को भी अवैध बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी चुनौती केवल पुराने निर्णयों पर आधारित नहीं है, बल्कि उन्होंने सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से ऐसे दस्तावेज और सबूत जुटाए हैं जो इन नियुक्तियों में गंभीर कानूनी खामियों को उजागर करते हैं। उन्होंने मांग की कि जो नियुक्तियां कानून के सही मापदंडों पर खरी नहीं उतरती हैं, उन्हें तत्काल रद्द किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र की रक्षा के लिए निष्पक्ष चुनाव आयोग अनिवार्य
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अंत में यह स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का गठन सीधे तौर पर भारत के चुनावी लोकतंत्र की शुद्धता से जुड़ा है। यदि नियुक्त करने वाली संस्था ही संदेह के घेरे में होगी, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में विस्तृत जवाब देने की अपेक्षा की है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस चयन समिति के ढांचे में बदलाव करने को तैयार होती है या अपनी वर्तमान स्थिति पर कायम रहती है।
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