Foreign Tribunal : पश्चिम बंगाल में फॉरेन ट्रिब्यूनल की अनुपस्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे विदेशी नागरिकों को बड़ी राहत दी है, जो अपनी सजा पूरी करने के बावजूद हिरासत में रखे गए हैं। शीर्ष अदालत ने अपने पहले के आदेश में संशोधन करते हुए स्पष्ट किया कि यदि जमानत की शर्तों को पूरा करने के लिए फॉरेन ट्रिब्यूनल के सामने पेश होने की आवश्यकता बताई गई है, लेकिन संबंधित राज्य में ऐसा ट्रिब्यूनल मौजूद नहीं है, तो विदेशी नागरिक ट्रायल कोर्ट का रुख कर सकते हैं। इससे उन लोगों के लिए कानूनी प्रक्रिया आसान होगी, जिनके मामले में ट्रिब्यूनल उपलब्ध नहीं है।
तीन सदस्यीय पीठ ने स्थिति की स्पष्टता की
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए अपने पूर्व आदेश की स्थिति स्पष्ट की। अदालत के सामने यह मुद्दा रखा गया था कि जमानत के आदेश में विदेशी नागरिकों को फॉरेन ट्रिब्यूनल के समक्ष रिपोर्ट करने की शर्त लगाई गई थी। हालांकि, पश्चिम बंगाल में वर्तमान में ऐसा कोई ट्रिब्यूनल मौजूद नहीं है। ऐसे में अदालत ने संबंधित व्यक्तियों को वैकल्पिक कानूनी रास्ता उपलब्ध कराया है।
2011 में सामने आया था हिरासत का मामला
इस पूरे मामले की शुरुआत करीब 15 साल पहले हुई थी। वर्ष 2011 में कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस को एक पत्र भेजकर बताया गया था कि कुछ बांग्लादेशी नागरिकों को फॉरेनर्स एक्ट के तहत दोषी ठहराए जाने के बाद सजा पूरी होने के बावजूद जेलों या सुधार गृहों में रखा जा रहा है। आरोप था कि सजा खत्म होने के बाद भी उन्हें उनके देश वापस भेजे जाने तक हिरासत में रखा गया था।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने लिया था स्वतः संज्ञान
विदेशी नागरिकों की लंबे समय तक हिरासत के मुद्दे पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने पत्र को गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बाद मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और वर्ष 2013 में इसे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भेजा गया। तब से शीर्ष अदालत इस मामले में समय-समय पर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करती रही है। मामला मुख्य रूप से उन विदेशी नागरिकों के अधिकारों और उनकी सजा पूरी होने के बाद हिरासत की वैधता से जुड़ा रहा है।
तीन साल बाद भी जेल में रहने वालों को राहत
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने ऐसे विदेशी नागरिकों के लिए जमानत का रास्ता साफ किया था, जो अपनी सजा पूरी होने के तीन साल बाद भी पश्चिम बंगाल की जेलों में बंद थे। अदालत ने कहा था कि निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर उन्हें जमानत दी जा सकती है। इसका उद्देश्य लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट न्यायिक आधार के हिरासत में रखे जाने की स्थिति को कम करना था।
जमानत के लिए रखी गई थीं कई शर्तें
पिछले आदेश के तहत जमानत पाने वाले विदेशी नागरिकों के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तें तय की गई थीं। इनमें एक लाख रुपये के दो भारतीय जमानतदार उपलब्ध कराना, रिहाई के बाद रहने के लिए सत्यापन योग्य पता देना और अपनी बायोमेट्रिक जानकारी दर्ज कराना शामिल था। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि रिहाई के बाद संबंधित व्यक्ति की पहचान और ठिकाने की जानकारी प्रशासन के पास उपलब्ध रहे।
हर सप्ताह पुलिस स्टेशन में रिपोर्टिंग का था नियम
पुराने आदेश में यह भी कहा गया था कि रिहा होने वाले विदेशी नागरिक को प्रत्येक सप्ताह संबंधित पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना होगा। इसके अलावा, यदि उसके रहने के पते में कोई बदलाव होता है तो इसकी जानकारी उसी दिन पुलिस को देनी होगी। पुलिस को भी प्रत्येक तीन महीने में संबंधित व्यक्ति के संबंध में रिपोर्ट तैयार करनी थी। जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर हिरासत और आगे की कानूनी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था।
अब ट्रायल कोर्ट का रास्ता हुआ आसान
नए स्पष्टीकरण के बाद पश्चिम बंगाल में रहने वाले ऐसे विदेशी नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। यदि पुराने आदेश में फॉरेन ट्रिब्यूनल के समक्ष रिपोर्ट करने की शर्त लागू होती है, लेकिन राज्य में ऐसा कोई ट्रिब्यूनल उपलब्ध नहीं है, तो संबंधित व्यक्ति ट्रायल कोर्ट से संपर्क कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण व्यावहारिक कठिनाई को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की प्रक्रिया को लेकर राहत दी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संबंधित विदेशी नागरिकों के खिलाफ सभी कानूनी कार्यवाही समाप्त हो गई है। जमानत की शर्तों का पालन करना अब भी आवश्यक रहेगा। साथ ही, उनकी नागरिकता, हिरासत और देश वापसी से जुड़े मुद्दों पर संबंधित कानूनों के अनुसार आगे की प्रक्रिया जारी रह सकती है। अदालत का ताजा आदेश मुख्य रूप से उस स्थिति को स्पष्ट करता है, जहां फॉरेन ट्रिब्यूनल मौजूद नहीं है।
मानवीय और कानूनी पहलू पर जोर
यह मामला सजा पूरी होने के बाद किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने से जुड़े कानूनी और मानवीय सवालों को भी सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उद्देश्य ऐसी स्थिति में संतुलन कायम करना है, जिसमें एक ओर राज्य की सुरक्षा और विदेशी नागरिकों से जुड़े कानूनों का पालन हो, वहीं दूसरी ओर सजा पूरी कर चुके लोगों को अनिश्चितकाल तक हिरासत में न रखा जाए। अब ट्रायल कोर्ट को वैकल्पिक मंच के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति से प्रक्रिया अधिक व्यावहारिक हो सकती है।
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