Telangana Dog Killing
Telangana Dog Killing: तेलंगाना के हनमकोंडा जिले से पशु क्रूरता की एक ऐसी रूह कंपा देने वाली घटना सामने आई है जिसने मानवीय संवेदनाओं पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के श्यामपेट और अरेपल्ली गांवों में लगभग 300 आवारा कुत्तों की बेरहमी से हत्या कर दी गई है। स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायतों की कथित मिलीभगत से अंजाम दी गई इस घटना ने पशु प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी रोष पैदा कर दिया है। बताया जा रहा है कि यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत इन बेजुबानों को मौत के घाट उतारा गया, जिससे पूरे इलाके में सन्नाटा पसरा हुआ है।
एनिमल वेलफेयर एक्टिविस्ट अदुलापुरम गौतम और फरजाना बेगम द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, यह सामूहिक हत्याकांड 6 जनवरी से शुरू होकर लगातार तीन दिनों तक चला। आरोप है कि इन कुत्तों को खाने में घातक जहर मिलाकर दिया गया, जिससे तड़प-तड़प कर उनकी मौत हो गई। क्रूरता की हद तो तब पार हो गई जब हत्या के बाद साक्ष्य छुपाने के लिए इन कुत्तों के शवों को आनन-फानन में गांवों के बाहरी इलाकों में सामूहिक रूप से दफना दिया गया। एक्टिविस्ट्स का दावा है कि बड़ी संख्या में शव मिलने के बावजूद स्थानीय अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज करने की कोशिश की, लेकिन सोशल मीडिया पर मामला गरमाने के बाद पुलिस हरकत में आई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए श्यामपेट पुलिस ने 9 जनवरी को औपचारिक रूप से एफआईआर दर्ज की है। इस मामले में पुलिस ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (Prevention of Cruelty to Animals Act) और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई शुरू कर दी है। शिकायत में सीधे तौर पर गांवों के सरपंचों और ग्राम पंचायत सचिवों को नामजद किया गया है। आरोप है कि सरकारी पदों पर बैठे इन जिम्मेदार लोगों ने न केवल इस अपराध की योजना बनाई बल्कि इसे अंजाम देने के लिए संसाधनों का भी उपयोग किया। पुलिस ने अब तक कुल 9 लोगों को इस जघन्य कृत्य के लिए आरोपी बनाया है।
एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट अदुलापुरम गौतम ने इस घटना को लोकतंत्र और मानवता के लिए एक काला धब्बा बताया है। उन्होंने मांग की है कि केवल एफआईआर दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि दोषियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो भविष्य में किसी के लिए मिसाल बने। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए नसबंदी (ABC Program) जैसे कानूनी और मानवीय तरीके उपलब्ध हैं, लेकिन सामूहिक हत्या का रास्ता चुनना पूरी तरह गैर-कानूनी है। फरजाना बेगम ने जांच में पारदर्शिता बरतने और दफनाए गए शवों का पोस्टमार्टम कराने की भी अपील की है ताकि जहर के प्रकार की पुष्टि हो सके।
इस घटना ने ग्राम पंचायतों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद कि किसी भी आवारा जानवर को मारा नहीं जा सकता, इस तरह का सामूहिक नरसंहार कैसे हुआ? स्थानीय लोगों का कहना है कि कुत्तों के आतंक से छुटकारा पाने के नाम पर यह कदम उठाया गया, लेकिन कानूनी जानकारों का कहना है कि पंचायत अधिकारियों को कानून हाथ में लेने का कोई अधिकार नहीं है। अब देखना यह होगा कि तेलंगाना सरकार और पशु कल्याण बोर्ड इस मामले में कितनी कड़ाई से कदम उठाते हैं ताकि भविष्य में मूक प्राणियों के साथ ऐसी दरिंदगी न दोहराई जाए।
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