Palestine State: इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच दशकों पुराना संघर्ष अब और अधिक गंभीर होता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन को पूर्ण सदस्यता देने के पक्ष में भारी समर्थन मिलने के कुछ ঘণ্টার মধ্যেই इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक चौंकाने वाला बयान देकर नया विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “फिलिस्तीन नाम का कोई देश नहीं रहेगा। पूरा क्षेत्र हमारा है।”
गुरुवार को नेतन्याहू ने विवादित E-1 सेटलमेंट प्रोजेक्ट पर हस्ताक्षर किए। यह परियोजना पूर्वी यरुशलम में हजारों नए यहूदी घरों के निर्माण की अनुमति देती है। इज़रायली रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में इस योजना को मंजूरी दी थी। विशेषज्ञों के अनुसार, इस परियोजना के चलते वेस्ट बैंक दो हिस्सों में बंट जाएगा और फिलिस्तीन की राजधानी के रूप में पूर्वी यरुशलम की कल्पना असंभव हो जाएगी। प्रोजेक्ट पर साइन करने के बाद नेतन्याहू ने कहा “हम अपनी विरासत, अपनी ज़मीन और अपनी सुरक्षा की रक्षा करेंगे। फिलिस्तीन नाम का कोई देश नहीं रहेगा।”
इसी बीच शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन को पूर्ण सदस्यता दिए जाने के प्रस्ताव पर वोटिंग हुई।142 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जिसमें भारत भी शामिल रहा।10 देशों ने विरोध किया, जिनमें अमेरिका, इज़रायल, अर्जेंटीना, हंगरी, पापुआ न्यू गिनी और पैराग्वे शामिल हैं।
इस प्रस्ताव में इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष के समाधान के लिए दो-राष्ट्र सिद्धांत (Two-State Solution) को समर्थन देने की बात कही गई है। इसके अलावा गाजा को हमास के नियंत्रण से मुक्त करने का भी आह्वान किया गया है।
7 अक्टूबर 2022 को हमास द्वारा इज़रायल पर हमला करने के बाद से यह संघर्ष और अधिक भीषण हो गया है। उस हमले में 1,200 लोग मारे गए,250 लोगों को बंधक बनाया गया।इसके जवाब में इज़रायल ने गाजा पर भीषण हमला शुरू किया।अब तक 60,000 से अधिक फिलिस्तीनियों की मौत हो चुकी है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित 150 से अधिक प्रस्तावों के बावजूद इज़रायल की नीतियों में कोई ठोस बदलाव नहीं आया है। हाल ही में गाजा में राहत सामग्री की कतारों में लगे नागरिकों पर गोलीबारी के आरोप भी इज़रायली सेना पर लगे हैं।
बेंजामिन नेतन्याहू का यह बयान और E-1 सेटलमेंट प्रोजेक्ट न केवल फिलिस्तीन राज्य की स्थापना को असंभव बना रहे हैं, बल्कि पश्चिम एशिया में शांति के प्रयासों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। वैश्विक समुदाय जहां दो-राष्ट्र समाधान को एकमात्र रास्ता मान रहा है, वहीं इज़रायल की यह नीति और भाषण क्षेत्रीय तनाव को और गहरा कर सकती है।
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