Trump Iran Ceasefire
Trump Iran Ceasefire : विश्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी भारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा कूटनीतिक दांव खेला है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ जारी सीजफायर (युद्धविराम) को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाने का ऐलान किया है। व्हाइट हाउस से जारी संकेतों और ट्रंप के बयानों के अनुसार, यह सीजफायर तब तक प्रभावी रहेगा जब तक ईरान कोई ठोस शांति प्रस्ताव अमेरिका के समक्ष पेश नहीं करता और दोनों देशों के बीच चल रही उच्च स्तरीय बातचीत किसी तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुँच जाती। इस फैसले ने वैश्विक बाजार और मिडिल ईस्ट की राजनीति में एक नई चर्चा छेड़ दी है।
हैरानी की बात यह है कि इस सीजफायर को बढ़ाने के पीछे पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका सामने आई है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान सरकार ने अमेरिका से बार-बार अनुरोध किया था कि ईरान पर सैन्य हमला करने के बजाय कूटनीति को एक और मौका दिया जाना चाहिए। इस्लामाबाद को डर था कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ता है, तो इसका सबसे बुरा असर पड़ोसी होने के नाते पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ेगा। पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञों ने पिछले कई दिनों से वाशिंगटन में डेरा डाल रखा था ताकि युद्ध को टाला जा सके।
अपने चिर-परिचित अंदाज में राष्ट्रपति ट्रंप ने इस फैसले की जानकारी अपने आधिकारिक ‘ट्रुथ सोशल’ अकाउंट के जरिए दी। उन्होंने लिखा कि यद्यपि ईरान की वर्तमान सरकार आंतरिक रूप से बिखरी हुई और कमजोर है, लेकिन वे मानवता और क्षेत्रीय स्थिरता के नाते इस “बिखरी हुई सरकार” को सुधरने का एक अंतिम अवसर दे रहे हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह कदम पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के विशेष अनुरोध पर उठाया है। ट्रंप के इस बयान से साफ है कि पाकिस्तान वर्तमान में अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण पुल का कार्य कर रहा है।
भले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने आसमान से बमबारी रोकने का फैसला किया है, लेकिन समुद्र में ईरान की मुश्किलें कम नहीं होने वाली हैं। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान के लिए नाकेबंदी (Blockade) पहले की तरह ही सख्त जारी रहेगी। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत ईरान के प्रमुख बंदरगाहों को घेरे रखेंगे ताकि किसी भी प्रकार का व्यापारिक या सैन्य आवागमन न हो सके। ट्रंप ने दो टूक कहा कि सीजफायर का मतलब यह कतई नहीं है कि युद्ध खत्म हो गया है या अमेरिका ने हार मान ली है। उन्होंने इसे एक रणनीतिक ठहराव बताया है, न कि ईरान की जीत।
ट्रंप के इस फैसले का पाकिस्तान ने गर्मजोशी से स्वागत किया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि वह अपनी ओर से और फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर की ओर से अमेरिकी नेतृत्व का शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने शांति की अपील को स्वीकार किया। पाकिस्तान को उम्मीद है कि अब दोनों पक्ष संयम बरतेंगे और इस्लामाबाद में होने वाली आगामी शांति वार्ता के दूसरे दौर में किसी स्थायी समझौते पर पहुँच सकेंगे। पाकिस्तान इस समय खुद को मिडिल ईस्ट के ‘पीसमेकर’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
उम्मीद के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका के इस कदम को शांति के बजाय एक “साजिश” करार दिया है। ईरान की संसद के अध्यक्ष के सलाहकार ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि अमेरिका युद्ध के मैदान में अपनी साख खो चुका है और हारने वाले पक्ष को दूसरों पर शर्तें थोपने का कोई नैतिक या कानूनी अधिकार नहीं है। ईरान का मानना है कि उसके बंदरगाहों की घेराबंदी करना किसी हवाई हमले से कम नहीं है क्योंकि इससे देश की अर्थव्यवस्था का दम घुट रहा है। तेहरान ने अमेरिका को चुनौती दी है कि वह छिपकर वार करने के बजाय सीधे सैन्य मैदान में आए।
ईरानी नेतृत्व को डर है कि ट्रंप का यह सीजफायर केवल एक छलावा है। ईरान के सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप अचानक हमला करने (Surprise Attack) की फिराक में हैं और सीजफायर के बहाने वह अपनी सेना को फिर से संगठित कर रहे हैं। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) को हाई अलर्ट पर रखा गया है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह अमेरिकी चालों को कामयाब नहीं होने देगा और किसी भी सैन्य दुस्साहस का “उचित और कठोर” जवाब दिया जाएगा। तेहरान की गलियों में अमेरिका विरोधी नारेबाजी एक बार फिर तेज हो गई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का वह संकरा समुद्री रास्ता है जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20-30 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। यदि यहाँ नाकेबंदी लंबे समय तक जारी रहती है, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। भारत, चीन और जापान जैसे एशियाई देशों के लिए यह मार्ग जीवनरेखा के समान है। अमेरिका द्वारा की गई नाकेबंदी ने न केवल ईरान बल्कि उन सभी देशों की चिंता बढ़ा दी है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर निर्भर हैं। विशेषज्ञ इसे “आर्थिक युद्ध” की संज्ञा दे रहे हैं।
अब सबकी नजरें इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता के दूसरे दौर पर टिकी हैं। क्या पाकिस्तान दोनों कट्टर दुश्मनों को एक मेज पर लाकर किसी समझौते पर हस्ताक्षर करा पाएगा? यह एक बड़ा सवाल है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह बंद करे और क्षेत्रीय आतंकवाद को समर्थन देना बंद करे, जबकि ईरान की शर्त है कि उस पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध तत्काल हटाए जाएं और अमेरिकी नौसेना खाड़ी से वापस जाए। दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि सीजफायर का यह दौर कभी भी टूट सकता है।
राष्ट्रपति ट्रंप का सीजफायर बढ़ाने का फैसला तात्कालिक रूप से युद्ध को टालने वाला लग सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। एक तरफ कूटनीतिक प्रयास चल रहे हैं, तो दूसरी तरफ समुद्र में युद्धपोत एक-दूसरे के सामने तैनात हैं। ईरान की आक्रामकता और ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” की नीति के बीच शांति की गुंजाइश बहुत कम नजर आती है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि मिडिल ईस्ट में अमन कायम होगा या यह क्षेत्र एक विनाशकारी महायुद्ध की आग में झुलस जाएगा। फिलहाल, दुनिया सांस रोककर इस घटनाक्रम को देख रही है।
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