US Troops in Nigeria
US Troops in Nigeria: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने पश्चिम अफ्रीका में सुरक्षा समीकरणों को बदलते हुए नाइजीरिया में 100 अमेरिकी सैनिकों की तैनाती की है। यह महत्वपूर्ण कदम नाइजीरियाई सरकार द्वारा की गई औपचारिक मांग के बाद उठाया गया है। पिछले कुछ समय से नाइजीरिया के विभिन्न हिस्सों में हो रहे भीषण नरसंहार और खूनी संघर्ष ने वैश्विक चिंताएं बढ़ा दी थीं। इन सैनिकों का प्राथमिक कार्य नाइजीरियाई सेना को तकनीकी सहायता प्रदान करना, प्रशिक्षण देना और अत्यंत महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी (Intelligence) साझा करना है। वाशिंगटन की इस नई रणनीति का दूरगामी लक्ष्य साहेल क्षेत्र में पैर पसार रहे खतरनाक आतंकी संगठनों को जड़ से उखाड़ फेंकना है।
नाइजीरिया के अशांत उत्तरी क्षेत्रों में तैनात किए गए ये 100 सैनिक अमेरिका की उस बड़ी योजना का हिस्सा हैं, जिसके तहत कुल 200 सैन्य कर्मियों को वहां भेजा जाना प्रस्तावित है। मेजर जनरल समाइला उबा ने स्पष्ट किया है कि अमेरिकी सैनिक सीधे तौर पर युद्ध के मोर्चे पर जाकर फायरिंग नहीं करेंगे। इसके बजाय, वे ‘सपोर्ट रोल’ में रहेंगे। उनका मुख्य फोकस नाइजीरियाई बलों को ड्रोन सर्विलांस, आधुनिक संचार प्रणालियों और सटीक टारगेट की पहचान करने का उन्नत प्रशिक्षण देना होगा। इससे स्थानीय सेना की मारक क्षमता में गुणात्मक सुधार आने की उम्मीद है।
नाइजीरिया वर्तमान में एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहा है। देश के उत्तर-पूर्वी इलाकों में बोको हरम, इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रॉविंस (ISWAP) और लकुरावा जैसे इस्लामिक आतंकी गुट सक्रिय हैं। इन संगठनों के साथ-साथ सशस्त्र ‘डाकू’ समूह भी आम नागरिकों के लिए काल बने हुए हैं। पिछले सप्ताह ही तीन गांवों में हुए भीषण हमलों में 46 निर्दोष लोगों की जान चली गई। सबसे दुखद घटना नाइजर राज्य के कोंकोसो गांव में हुई, जहां हमलावरों ने बेरहमी से 38 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। ये समूह फिरौती के लिए अपहरण और अवैध खनन जैसी गतिविधियों के माध्यम से अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत कर रहे हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2025 के अंत से ही नाइजीरियाई प्रशासन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था। ट्रंप ने खुले तौर पर ईसाइयों के खिलाफ हो रहे नरसंहार को रोकने में विफलता के लिए स्थानीय सरकार की आलोचना की थी। दिसंबर 2025 में क्रिसमस के मौके पर अमेरिकी सेना द्वारा किए गए मिसाइल हमले इस बात का प्रमाण थे कि ट्रंप प्रशासन अब आतंकवाद के खिलाफ ‘डायरेक्ट एक्शन’ से पीछे नहीं हटेगा। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की नई विदेश नीति में धार्मिक उत्पीड़न को रोकना और ईसाई समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता बन गया है।
नाइजीरिया की लगभग 24 करोड़ की आबादी में ईसाई और मुस्लिम समुदायों की संख्या लगभग बराबर है। हालांकि हिंसा का शिकार दोनों धर्मों के लोग हो रहे हैं, लेकिन पड़ोसी साहेल क्षेत्र से हो रही घुसपैठ ने स्थिति को अधिक भयावह बना दिया है। ‘जमात नुसरत अल-इस्लाम’ जैसे बाहरी समूहों की सक्रियता ने उत्तर नाइजीरिया को एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिया है। हजारों लोग अपने पैतृक घरों को छोड़कर विस्थापित होने पर मजबूर हैं, जिससे देश में एक गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया है।
अमेरिकी सैनिकों द्वारा दिए जाने वाले प्रशिक्षण से यह उम्मीद जताई जा रही है कि नाइजीरियाई सेना अब आतंकवादियों पर पहले से कहीं अधिक प्रभावी तरीके से दबाव बना सकेगी। ड्रोन इंटेलिजेंस और आधुनिक हथियारों के सटीक उपयोग से आम नागरिकों की जानमाल के नुकसान में कमी आएगी। यह सैन्य सहयोग न केवल नाइजीरिया बल्कि पूरे साहेल क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
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