Middle East Crisis
Middle East Crisis : ईरान और अमेरिका-इजरायल गठबंधन के बीच जारी भीषण युद्ध अब एक विनाशकारी मोड़ पर पहुंच गया है। ताजा घटनाक्रम में, ईरान के सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक रूप से खास माने जाने वाले ‘B1 ब्रिज’ को संयुक्त हवाई हमले में पूरी तरह तबाह कर दिया गया है। इस हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए ईरान को अंतिम चेतावनी दी है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि ईरान का सबसे बड़ा पुल अब मलबे का ढेर बन चुका है और अब समय आ गया है कि तेहरान समझौता कर ले, वरना उस देश में कुछ भी शेष नहीं बचेगा।
जिस पुल को निशाना बनाया गया है, वह ईरान के अल्बोर्ज प्रांत के करज शहर में स्थित था। इसे न केवल ईरान बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट का सबसे ऊंचा और आधुनिक पुल माना जाता था। लगभग 136 मीटर की ऊंचाई और 1,050 मीटर की लंबाई वाले इस विशालकाय ढांचे को बनाने में करीब 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर (भारतीय मुद्रा में 37,000 करोड़ रुपये से अधिक) का खर्च आया था। 8 सेक्शन में बंटा यह पुल ईरान की लाइफलाइन माना जाता था। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में इस भव्य पुल को ताश के पत्तों की तरह ढहते हुए देखा जा सकता है, जो ईरान पर हो रही घातक बमबारी की भयावहता को दर्शाता है।
पुल की तबाही के बाद राष्ट्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका और इजरायल की साझा सैन्य कार्रवाई ने तेहरान की सैन्य रीढ़ को लगभग तोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के रणनीतिक लक्ष्य अब पूरे होने के करीब हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी वायुसेना और मिसाइल यूनिट अगले 2-3 हफ्तों तक ईरान पर और भी जोरदार प्रहार करेगी। उन्होंने आने वाले दिनों में ईरान के मुख्य ‘पावर प्लांट्स’ और ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाने की खुली धमकी भी दी है, जिससे पूरे देश में ब्लैकआउट का खतरा मंडरा रहा है।
युद्ध के मैदान से इतर, ईरान के भीतर आम नागरिकों की स्थिति बदतर होती जा रही है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज (IFRC) ने चेतावनी जारी की है कि ईरान में आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की मांग में अप्रत्याशित उछाल आया है। रेड क्रॉस के प्रतिनिधिमंडल प्रमुख के अनुसार, यदि जंग इसी तीव्रता से जारी रही, तो अस्पतालों में ‘ट्रॉमा किट’ और जीवनरक्षक दवाओं का स्टॉक खत्म हो जाएगा। युद्ध के कारण ईरान की स्वास्थ्य प्रणाली ढहने की कगार पर है और घायलों की बढ़ती संख्या डॉक्टरों के नियंत्रण से बाहर हो रही है।
जब से 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने हवाई हमले शुरू किए हैं, तब से ईरान में मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। आधिकारिक और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के आंकड़ों के मुताबिक, इस एक महीने की जंग में अब तक 2,000 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। वहीं, घायलों का आंकड़ा 26,500 के पार पहुंच गया है। रिहायशी इलाकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों पर हो रही बमबारी ने लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया है, जिससे इस क्षेत्र में एक बड़ा शरणार्थी संकट खड़ा होने की संभावना बढ़ गई है।
राष्ट्रपति ट्रंप के “समझौता कर लो” वाले बयान से यह स्पष्ट है कि अमेरिका अब ईरान को पूरी तरह घुटनों पर लाने की रणनीति अपना रहा है। एक तरफ जहां सैन्य कार्रवाई तेज हो रही है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय शांति की अपील कर रहा है। अब यह पूरी तरह ईरान के नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वे विनाश के इस रास्ते पर आगे बढ़ते हैं या ट्रंप द्वारा दिए गए ‘समझौते’ के विकल्प पर विचार करते हैं। फिलहाल, मिडिल ईस्ट का आसमान बारूद के धुएं से भरा हुआ है और आने वाले कुछ हफ्ते इस युद्ध का अंतिम परिणाम तय करेंगे।
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