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Global Crisis: UAE का अमेरिका पर दबाव! युद्ध के नुकसान की भरपाई न होने पर डॉलर को छोड़ने की दी चेतावनी!

Global Crisis:  ईरान और अमेरिका के बीच जारी भीषण सैन्य संघर्ष ने मध्य-पूर्व (मिडिल-ईस्ट) के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। खाड़ी देशों में अब अमेरिका के प्रति नाराजगी और दूरी साफ देखी जा सकती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का वह कड़ा रुख है, जिसमें उसने इस युद्ध के लिए सीधे तौर पर वाशिंगटन को जिम्मेदार ठहराया है। यूएई ने न केवल अमेरिका को युद्ध शुरू करने का दोषी माना है, बल्कि इस युद्ध से हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए ‘वित्तीय गारंटी’ की मांग भी कर दी है। यह मांग अमेरिका के लिए एक नए आर्थिक और कूटनीतिक संकट का संकेत दे रही है।

अरबों डॉलर का नुकसान: अमेरिका के लिए महंगा सौदा

वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए इस युद्ध में अमेरिका अब तक रोजाना 89 करोड़ से 1 अरब डॉलर के बीच खर्च कर रहा है। वहीं, इजरायल का खर्च भी 11.2 बिलियन डॉलर के पार पहुंच गया है। लेकिन असली संकट खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे को हुई क्षति है। अनुमान है कि सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों में नागरिक और ऊर्जा ढांचे की मरम्मत के लिए 60 बिलियन डॉलर से अधिक की आवश्यकता होगी। इसमें से लगभग 50 बिलियन डॉलर अकेले तेल और गैस सुविधाओं को दोबारा शुरू करने के लिए चाहिए। यूएई इस युद्ध में सबसे अधिक प्रभावित होने वाला देश बनकर उभरा है।

दुबई की बर्बादी: मिसाइल हमलों से ढही इमारतें और ऊर्जा केंद्र

ईरान द्वारा दागी गई मिसाइलों और ड्रोनों ने दुबई के मशहूर ‘फेयरमॉंट द पाम होटल’ जैसे नागरिक ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा फुजैरा तेल निर्यात टर्मिनल जैसी महत्वपूर्ण ऊर्जा संपत्तियों को भी निशाना बनाया गया। तकनीकी स्तर पर भी झटका बड़ा है; अमेजन के दो डेटा सेंटर नष्ट होने से पूरे क्षेत्र की बैंकिंग और क्लाउड सेवाएं ठप हो गई हैं। इसी आर्थिक चोट के कारण यूएई सेंट्रल बैंक के गवर्नर खालिद मोहम्मद बालामा ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व से ‘करेंसी स्वैप’ और वित्तीय सुरक्षा जाल (Backstop) की मांग उठाई है, ताकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से गिरे डॉलर राजस्व की भरपाई की जा सके।

पटकथा का उलटफेर: अब अमेरिका चुकाए युद्ध का दाम

ऐतिहासिक रूप से 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान सऊदी अरब और कुवैत ने अमेरिका को लगभग 32 बिलियन डॉलर की मदद दी थी। लेकिन 2026 की तस्वीर अलग है। यूएई का तर्क है कि अमेरिका ने क्षेत्रीय सहयोगियों से चर्चा किए बिना यह युद्ध शुरू किया, इसलिए इसका वित्तीय बोझ भी वाशिंगटन को ही उठाना चाहिए। यह मांग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उनकी सरकार खुद खाड़ी देशों से पैसे मांगने की योजना बना रही थी। यूएई की इस पलटवार वाली नीति ने व्हाइट हाउस को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है।

ईरान की मांग और ट्रंप की बढ़ती मुश्किलें

ट्रंप के सामने मुसीबत तब और बढ़ गई जब ईरान ने भी अपने पड़ोसी देशों (यूएई, सऊदी, कतर आदि) से 270 बिलियन डॉलर के मुआवजे की मांग कर दी। कतर की एलएनजी निर्यात क्षमता का 17 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है और सऊदी अरब को अपनी बड़ी तेल रिफाइनरियां बंद करनी पड़ी हैं। पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता बेनतीजा रहने के कारण युद्धविराम की उम्मीदें कम हैं। यदि अमेरिका यूएई को मुआवजा देता है, तो कतर और सऊदी अरब जैसे देश भी इसी तरह की मांगों की कतार में खड़े हो सकते हैं।

डॉलर को खतरा: युआन की ओर झुकता यूएई

यूएई ने अमेरिका को एक बेहद गंभीर चेतावनी दी है। सेंट्रल बैंक गवर्नर ने संकेत दिया है कि यदि युद्ध के कारण डॉलर की उपलब्धता में कमी आई, तो यूएई अपने तेल निर्यात और अन्य अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए चीनी युआन (Yuan) या अन्य मुद्राओं का उपयोग शुरू कर सकता है। यह कदम अमेरिकी डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व (Petrodollar) के लिए एक सीधा और बड़ा खतरा है। यूएई की यह ‘करेंसी स्वैप’ की मांग और युआन की ओर शिफ्ट होने की धमकी, वाशिंगटन को वित्तीय बैकस्टॉप देने के लिए मजबूर करने का एक बड़ा कूटनीतिक दबाव है।

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