Uddhav Thackeray Protest: महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) ने जनसुरक्षा कानून के खिलाफ 11 सितंबर (बुधवार) से राज्यव्यापी आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। यह आंदोलन सरकार द्वारा हाल ही में पारित जनसुरक्षा कानून को रद्द करने की मांग को लेकर किया जा रहा है।

इस आंदोलन की शुरुआत मुंबई के शिवाजी पार्क में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा के पास प्रदर्शन के साथ होगी। इसमें खुद उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, सचिन अहीर, भास्कर जाधव, सुनील प्रभु सहित शिवसेना के कई वरिष्ठ नेता शामिल होंगे। पार्टी ने साफ कर दिया है कि यह आंदोलन जिला स्तर पर भी विस्तारित किया जाएगा।

क्या है जनसुरक्षा कानून?
जनसुरक्षा कानून, जिसे हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा में पारित किया गया, को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि यह कानून नक्सलवाद और शहरी माओवाद को रोकने के लिए जरूरी है। उन्होंने खासतौर से गडचिरोली और कोकण जैसे क्षेत्रों का हवाला देते हुए कहा कि वहां की उग्रवादी गतिविधियां कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन रही हैं।
फडणवीस का कहना है कि यह कानून राज्य की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए अहम है, खासकर उन तत्वों के खिलाफ जो लोकतंत्र का इस्तेमाल कर उसे कमजोर करना चाहते हैं।
शिवसेना (UBT) को क्या आपत्ति है?
उद्धव ठाकरे ने इस कानून को “लोकतंत्र पर हमला” करार दिया है। उनका कहना है कि “इस कानून में ‘शहरी नक्सल’ और ‘वामपंथी विचारधारा’ जैसे शब्दों का प्रयोग करके सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों, छात्र संगठनों, किसान आंदोलनों और मानवाधिकार समूहों को दबाना चाहती है।”
ठाकरे ने यह भी कहा कि कानून में नक्सलवाद या आतंकवाद का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, बल्कि केवल उग्रवादी विचारधारा की बात कही गई है—जो सरकार की आलोचना करने वाले किसी भी व्यक्ति या संगठन पर लागू हो सकती है।
आंदोलन की रणनीति
आंदोलन की शुरुआत मुंबई से होगी, लेकिन इसके बाद यह पूरे महाराष्ट्र के जिला मुख्यालयों तक पहुंचेगा। शिवसेना के सभी प्रमुख नेता मैदान में उतरेंगे। पार्टी का लक्ष्य है कि जनता के बीच इस कानून के खतरों को लेकर जागरूकता फैलाई जाए।
महाराष्ट्र में जनसुरक्षा कानून को लेकर मचा यह राजनीतिक घमासान अब सड़कों पर आ चुका है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना इस कानून को जनतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ मानती है, जबकि सरकार इसे राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा मोड़ ला सकता है।










