US-Iran Nuclear Talks
US-Iran Nuclear Talks: स्विट्जरलैंड के जिनेवा में आज वैश्विक राजनीति का केंद्र बिंदु स्थानांतरित हो गया है, जहाँ अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर दूसरे दौर की अत्यंत संवेदनशील वार्ता शुरू हो रही है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची एक शक्तिशाली प्रतिनिधिमंडल के साथ पहले ही जिनेवा पहुँच चुके हैं। वहीं, अमेरिका की ओर से मध्य पूर्व दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर सुबह 8 बजे तक वार्ता स्थल पर पहुँच गए। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव और राजनीतिक अविश्वास चरम पर है। दुनिया भर के कूटनीतिज्ञ इस बैठक को मध्य पूर्व में शांति बहाली की आखिरी उम्मीद के रूप में देख रहे हैं।
इस वार्ता की सबसे बड़ी विशेषता ओमान की महत्वपूर्ण भूमिका है, जो दोनों देशों के बीच एक सेतु का काम कर रहा है। तेहरान के आधिकारिक सूत्रों ने पुष्टि की है कि यह चर्चा अप्रत्यक्ष रूप से आयोजित की जा रही है। वाशिंगटन ने स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगा; इसमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों (Proxies) की गतिविधियों पर भी गहन मंथन होगा। अमेरिका ने अपना रुख कड़ा रखते हुए संकेत दिया है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ईरान को ठोस और पारदर्शी कदम उठाने होंगे, तभी प्रतिबंधों पर विचार संभव होगा।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख से मुलाकात के बाद अपनी मंशा साफ कर दी है। उन्होंने कहा कि ईरान एक “न्यायसंगत और संतुलित” समझौते के लिए तैयार है और उनके पास मेज पर रखने के लिए ठोस प्रस्ताव हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ईरान किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव या धमकी के आगे घुटने नहीं टेकेगा। ईरान का प्राथमिक उद्देश्य उन आर्थिक प्रतिबंधों से मुक्ति पाना है जिन्होंने उसकी अर्थव्यवस्था को जकड़ रखा है, जबकि अमेरिका ‘अधिकतम दबाव’ की नीति पर कायम है।
बातचीत की मेज पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ईरान ने कूटनीति के साथ-साथ सैन्य शक्ति का भी प्रदर्शन किया है। वार्ता शुरू होने से ठीक पहले ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य में सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया। ज्ञात हो कि यह जलमार्ग दुनिया की 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति का गवाह है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस सैन्य गतिविधि के जरिए तेहरान यह संदेश देना चाहता है कि यदि वार्ता विफल होती है, तो उसके पास वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करने वाले विकल्प मौजूद हैं।
वार्ता का सबसे तकनीकी और विवादित हिस्सा ईरान का 60 प्रतिशत तक समृद्ध यूरेनियम भंडार है। अमेरिका और उसके सहयोगी चाहते हैं कि ईरान इस संवर्धन को तत्काल रोके और भंडार को देश से बाहर भेजे। ईरानी उप विदेश मंत्री ने संकेत दिया है कि यदि प्रतिबंधों में वास्तविक ढील दी जाती है, तो वे संवर्धन के स्तर पर लचीलापन दिखा सकते हैं। वहीं, इजरायल ने अपना कड़ा रुख दोहराते हुए मांग की है कि ईरान की परमाणु क्षमता को पूरी तरह से नष्ट किया जाना चाहिए, जो इस वार्ता की सफलता में एक बड़ी बाधा बन सकता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस वार्ता को लेकर सावधानीपूर्वक उम्मीद जताई है। उनके अनुसार, जिनेवा की यह चर्चा केवल एक द्विपक्षीय विवाद नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति और तेल बाजार की स्थिरता के लिए एक निर्णायक मोड़ है। यदि यहाँ से कोई सकारात्मक ढांचा निकलकर आता है, तो यह मध्य पूर्व में एक नए युग की शुरुआत होगी। अन्यथा, सैन्य तनाव के बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा संकट और गहरा सकता है। अब पूरी दुनिया की नजरें जिनेवा से निकलने वाले आधिकारिक बयानों पर टिकी हैं।
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