US oil Tariff : अमेरिका के शीर्ष सांसदों ने रूस से तेल और यूरेनियम का आयात करने वाले देशों पर सख्त प्रतिबंध लगाने की अपनी मांग दोहराई है। डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल और रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने एक प्रस्तावित विधेयक के तहत ऐसे देशों पर भारी टैरिफ लगाने की सिफारिश की है, जो अब भी रूस के साथ ऊर्जा व्यापार कर रहे हैं। इसमें भारत और चीन मुख्य रूप से शामिल बताए जा रहे हैं। यह बयान इटली के रोम में आयोजित यूक्रेन समर्थन सम्मेलन के दौरान सामने आया।
सीनेटरों के अनुसार, इस प्रस्तावित विधेयक का मकसद रूस की आर्थिक ताकत को कमजोर करना और यूक्रेन के पक्ष में वैश्विक समर्थन को और मजबूती देना है। सीनेटर ब्लूमेंथल और ग्राहम ने कहा कि रूस से तेल या यूरेनियम आयात करने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। उनका मानना है कि इससे रूस की आय के प्रमुख स्रोतों को प्रभावित किया जा सकेगा, जो वह यूक्रेन के खिलाफ अपने युद्ध अभियान को जारी रखने के लिए इस्तेमाल कर रहा है।
सीनेटर ब्लूमेंथल ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस विधेयक का सबसे बड़ा असर भारत और चीन पर पड़ेगा, जो रूस के ऊर्जा निर्यात के सबसे बड़े ग्राहक बनकर उभरे हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में रूस की ऊर्जा बिक्री का लगभग 70% हिस्सा भारत और चीन ही खरीद रहे हैं। यही वजह है कि यह प्रस्तावित विधेयक विशेष रूप से इन दोनों देशों को लक्षित करता है।
सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने एक इंटरव्यू में दो टूक कहा, “अगर भारत और चीन रूस से तेल खरीदना जारी रखते हैं, तो उन्हें इसके लिए भारी कीमत चुकानी होगी।” उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की ऊर्जा खरीद से ये देश अप्रत्यक्ष रूप से रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को आर्थिक समर्थन दे रहे हैं। ग्राहम ने कहा कि अब समय आ गया है कि वैश्विक समुदाय रूस के खिलाफ और कड़े कदम उठाए।
ब्लूमेंथल और ग्राहम ने संकेत दिया कि यह विधेयक जल्द ही अमेरिकी संसद में पेश किया जाएगा और इस पर जुलाई 2025 के भीतर चर्चा शुरू हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस बिल को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भी समर्थन मिल सकता है, जिससे विधेयक को राजनीतिक बल मिलने की संभावना है।
यह विधेयक अमेरिका की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य रूस को वैश्विक ऊर्जा बाजार से अलग-थलग करना है। अमेरिका का मानना है कि रूस की ऊर्जा से होने वाली आय ही उसके युद्ध प्रयासों को आर्थिक मजबूती देती है। ऐसे में यदि रूस की ऊर्जा बिक्री को वैश्विक स्तर पर कम किया जाए, तो उसे यूक्रेन के खिलाफ लंबे युद्ध में टिके रहना मुश्किल हो जाएगा।
भारत ने रूस से ऊर्जा खरीद पर अमेरिकी दबाव को अब तक सीधे तौर पर अस्वीकार किया है। भारत की ओर से यह तर्क दिया गया है कि ऊर्जा सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है और वह किसी भी एक पक्षीय भू-राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा बनने के बजाय संतुलन बनाए रखना चाहता है। भारत का कहना है कि वैश्विक बाजारों में कीमतों और उपलब्धता को देखते हुए वह अपने हितों के अनुसार निर्णय लेता है।
राजनयिक और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो इससे भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा और व्यापारिक सहयोग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे समय में जब दोनों देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सैन्य सहयोग, तकनीकी साझेदारी और व्यापारिक समझौतों को आगे बढ़ा रहे हैं, यह प्रस्ताव संभावित रूप से द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव का कारण बन सकता है।
इस प्रस्तावित विधेयक ने एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति में ऊर्जा के महत्व को उजागर कर दिया है। अमेरिका जहां रूस को अलग-थलग करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है, वहीं भारत और चीन जैसे देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी कांग्रेस में यह विधेयक कितनी तेजी से आगे बढ़ता है और इसका भारत जैसे देशों की विदेश नीति पर क्या असर पड़ता है।
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