Uttarakhand Bear Terro
Uttarakhand Bear Terror: उत्तराखंड के उत्तरकाशी, पौड़ी, पिथौरागढ़, चमोली और रुद्रप्रयाग जैसे दुर्गम पहाड़ी जिलों में जंगली भालुओं के बढ़ते हमले एक गंभीर चुनौती बन गए हैं। गांवों में दहशत का आलम यह है कि सूरज ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है और हालात किसी अघोषित कर्फ्यू जैसे हो जाते हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 25 वर्षों में भालुओं के हमलों ने 71 लोगों की जान ली है और 2,000 से अधिक लोगों को घायल किया है। विशेष रूप से साल 2025 में यह संकट अपने चरम पर पहुंच गया है, जहां अब तक करीब 80 हमले हो चुके हैं और 8 लोगों की मौत दर्ज की गई है।
वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के पूर्व वैज्ञानिक और भालू विशेषज्ञ डॉ. एस. सत्याकुमार के अनुसार, भालुओं के आक्रामक होने की सबसे बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन है। हिमालयी क्षेत्रों में अब पहले जैसी बर्फबारी और ठंड नहीं पड़ती, जिसके कारण भालुओं की ‘शीत निद्रा’ (हाइबरनेशन) की अवधि कम हो गई है। भालू आमतौर पर सर्दियों में भोजन की कमी से बचने के लिए सोते हैं, लेकिन अब तापमान बढ़ने और साल भर भोजन उपलब्ध होने के कारण वे सक्रिय रहते हैं। कश्मीर में हुई एक रिसर्च के अनुसार, 100 साल पहले भालू 120 दिनों तक शीत निद्रा लेते थे, जो अब घटकर मात्र 40 से 80 दिन रह गई है। शीत निद्रा न लेने के कारण उनकी सक्रियता और इंसानों से टकराव बढ़ गया है।
भालुओं के रिहायशी इलाकों की तरफ आने का एक बड़ा कारण कचरा प्रबंधन की विफलता है। केदारघाटी जैसे क्षेत्रों में पर्यटकों द्वारा फैलाया गया 20 टन से ज्यादा कूड़ा भालुओं को आकर्षित कर रहा है, क्योंकि वे सड़े हुए कूड़े और मांसाहारी अवशेषों को खाना पसंद करते हैं। इसके अलावा, जंगलों में सड़कों का निर्माण और विकास परियोजनाओं के कारण भालुओं के प्राकृतिक आवास (हैबिटेट) नष्ट हो रहे हैं। गांवों के आसपास सेब के बाग और फूलों की खेती होने से उन्हें बिना मेहनत के भोजन मिल रहा है, जिससे मानव और भालू के बीच की दूरी कम हो गई है।
भालुओं को आबादी से दूर रखने के लिए अब आधुनिक तकनीक का सहारा लेना अनिवार्य हो गया है। ‘सोलर फेंसिंग’ (सौर बाड़) खेतों में जंगली जानवरों के प्रवेश को रोकने में काफी प्रभावी साबित हुई है, हालांकि यह महंगी है और इसके लिए सरकारी सब्सिडी की आवश्यकता है। इसके अलावा, ‘मोशन सेंसर अलर्ट’ का उपयोग किया जा रहा है, जो किसी भी हलचल पर अलार्म बजाकर ग्रामीणों को सतर्क कर देता है। पैटर्न वाली ‘फॉक्स लाइट्स’ का भी इस्तेमाल हो रहा है, जिनकी बदलती रोशनी से भालू भ्रमित होकर दूर भागते हैं।
डॉ. सत्याकुमार का मानना है कि इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान केवल कचरे के सही प्रबंधन और जंगलों में मानवीय दखल को कम करने में है। लैंडफिल साइटों को इस तरह से कवर करना चाहिए कि भालू वहां तक न पहुंच सकें। चूंकि भालू बहुत चालाक जानवर हैं, इसलिए सेंसर और लाइटों के पैटर्न को समय-समय पर बदलना भी जरूरी है। जब तक इंसानी संसाधनों और भालू के भोजन के बीच एक स्पष्ट दूरी नहीं बनाई जाएगी, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।
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