Venezuela Crisis 2026:
Venezuela Crisis 2026: लैटिन अमेरिका के देश वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की कथित गिरफ्तारी के बाद वैश्विक राजनीति में उबाल आ गया है। जहाँ एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी जीत का जश्न मना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर रूस ने इस सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। रूस का यह बयान न केवल वेनेजुएला के प्रति उसकी वफादारी को दर्शाता है, बल्कि यह वाशिंगटन के लिए एक गंभीर कूटनीतिक चेतावनी भी है कि वह इस क्षेत्र में अपनी मनमानी नहीं चलने देगा।
अमेरिकी सेना की आक्रामक कार्रवाई और राष्ट्रपति मादुरो को उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स के साथ हिरासत में लेकर देश से बाहर भेजने के दावे पर रूस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। रूसी विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा, “हम वेनेजुएला के लोगों के साथ अपनी अटूट एकजुटता प्रकट करते हैं और इसके वैध बोलिवेरियन नेतृत्व (मादुरो सरकार) के लिए अपने पूर्ण समर्थन की पुष्टि करते हैं।” रूस का यह बयान उस समय आया है जब वेनेजुएला के भीतर अमेरिकी सैनिक जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने का दावा कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस की यह प्रतिक्रिया अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक नए बड़े टकराव का संकेत है। अमेरिका द्वारा एक संप्रभु राष्ट्र के प्रमुख को पकड़कर ले जाना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन माना जा रहा है। ऐसे में रूस द्वारा मादुरो का खुला समर्थन करना यह बताता है कि मॉस्को इस मुद्दे को चुपचाप नहीं देखेगा। सवाल यह उठ रहा है कि क्या रूस की यह एकजुटता केवल बयानों तक सीमित रहेगी या वह वेनेजुएला के भीतर अमेरिका को चुनौती देने के लिए अपनी सैन्य शक्ति का भी इस्तेमाल कर सकता है।
वेनेजुएला पर अमेरिका का यह हमला कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से चल रही रणनीतिक खींचतान है। पिछले कुछ महीनों में राष्ट्रपति मादुरो ने कई ऐसे कदम उठाए जिन्होंने दक्षिण अमेरिका में अमेरिकी दबदबे को सीधी चुनौती दी। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है, और इसकी ऊर्जा नीति हमेशा से ही वाशिंगटन की चिड़ का कारण रही है।
तनाव तब और बढ़ गया जब मादुरो ने एक तरफ अमेरिकी कंपनियों को वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में निवेश का ऑफर दिया, तो दूसरी तरफ रूस के साथ अपने सैन्य और आर्थिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ कर लिया। रूस ने वेनेजुएला के तेल टैंकरों और संसाधनों को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचाने के लिए बड़ा कूटनीतिक कवच प्रदान किया। इसी बीच, वेनेजुएला ने चीन के साथ भी अपने रणनीतिक रिश्तों को मजबूत करने के संकेत दिए। अमेरिका को लगा कि रूस और चीन का वेनेजुएला में बढ़ता प्रभाव उसके पिछवाड़े (Backyard) में एक बड़ा खतरा पैदा कर रहा है, जिससे चिढ़कर ट्रंप प्रशासन ने यह कठोर सैन्य कार्रवाई की।
रूस के इस कड़े रुख के बाद अब पूरी दुनिया की नजरें संयुक्त राष्ट्र (UN) पर टिकी हैं। यदि रूस और चीन मिलकर सुरक्षा परिषद में अमेरिका के इस कदम का विरोध करते हैं, तो अमेरिका के लिए वेनेजुएला में अपनी कार्रवाई को सही ठहराना मुश्किल होगा। फिलहाल, वेनेजुएला की धरती एक बड़े ‘प्रॉक्सि वॉर’ (छद्म युद्ध) का मैदान बनती नजर आ रही है, जहाँ एक तरफ अमेरिका अपनी ‘सत्ता परिवर्तन’ की नीति पर अडिग है, तो दूसरी तरफ रूस अपने मित्र देश की संप्रभुता बचाने के नाम पर खड़ा है।
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