Vice President Race : 74 वर्षीय जगदीप धनखड़ ने हाल ही में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद को लेकर नई सियासी हलचल शुरू हो गई है। इस्तीफे की टाइमिंग और राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए यह स्पष्ट है कि बीजेपी के रणनीतिकार अब अगले उम्मीदवार को लेकर गहन मंथन में जुटे हैं। ऐसे में देश की राजनीति में यह सवाल प्रमुख हो गया है कि अब नया उपराष्ट्रपति कौन होगा?
उपराष्ट्रपति पद के संभावित दावेदारों की सूची में सबसे ऊपर नाम है जदयू के वरिष्ठ नेता हरिवंश नारायण सिंह का, जो वर्तमान में राज्यसभा के उपसभापति हैं। वे नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाते हैं और पिछले कुछ वर्षों से संसद की कार्यवाही को प्रभावी ढंग से संचालित करते आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बीजेपी बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए हरिवंश को यह पद देकर नीतीश के प्रभाव को कम करने और बिहार में नया समीकरण गढ़ने की कोशिश कर सकती है।
संविधान के अनुसार, यदि उपराष्ट्रपति पद रिक्त हो जाता है, तो छह महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य होता है। इस दौरान, राज्यसभा के उपसभापति को कार्यवाहक रूप में उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति दोनों की जिम्मेदारी संभालनी होती है। ऐसे में अगर समय पर चुनाव नहीं हुए तो हरिवंश स्वाभाविक रूप से यह जिम्मेदारी संभालेंगे। मगर इससे पहले ही उनकी स्थायी नियुक्ति की संभावनाएं प्रबल हो चुकी हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह पद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी दिया जा सकता है। आरएसएस की सेवानिवृत्ति आयु 75 वर्ष के दायरे में आने के कारण उन्हें अब प्रधानमंत्री पद की दौड़ से अलग करने की जरूरत हो सकती है। ऐसे में उपराष्ट्रपति पद की पेशकश उन्हें सम्मानपूर्वक सक्रिय राजनीति से अलग करने का एक तरीका मानी जा रही है। राजनाथ के अनुभव और कद को देखते हुए यह एक संवेदनशील लेकिन रणनीतिक कदम हो सकता है।
एक और बड़ा नाम जो सामने आ रहा है वह है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का। भाजपा उन्हें उपराष्ट्रपति बनाकर बिहार की सत्ता से बाहर कर सकती है और इस तरह राज्य में अपने चेहरे को प्रमुखता से आगे बढ़ा सकती है। यह कदम नीतीश की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को शांत करने के साथ-साथ राज्य में भाजपा के एकछत्र प्रभाव को मजबूत कर सकता है।
हाल के दिनों में कांग्रेस सांसद शशि थरूर का नाम भी सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में उभरा है। उन्हें उदार, बौद्धिक और अंतरराष्ट्रीय समझ रखने वाला नेता माना जाता है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने थरूर की बार-बार सार्वजनिक सराहना की है, जिससे इस संभावना को बल मिला है कि वे भाजपा में शामिल हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो उन्हें उपराष्ट्रपति बनाकर सरकार अपनी लोकतांत्रिक और सर्वसमावेशी छवि को मजबूत कर सकती है।
संविधान के तहत, उपराष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित और मनोनीत सदस्य मिलकर करते हैं। इस चुनाव में विधानसभा के सदस्य भाग नहीं लेते, जबकि राष्ट्रपति चुनाव में राज्य विधानसभाओं के सदस्य भी वोटिंग में भाग लेते हैं। ऐसे में यह चुनाव पूरी तरह संसद के भीतर की रणनीति और समर्थन पर निर्भर करता है।
धनखड़ के इस्तीफे और नए उपराष्ट्रपति की तलाश को बिहार विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। भाजपा बिहार में ओबीसी और ग्रामीण वोट बैंक को साधने के लिए ऐसा चेहरा चुनना चाहती है, जो वहां के राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर सके। ऐसे में हरिवंश, नीतीश या राजनाथ जैसे नामों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
धनखड़ के इस्तीफे के बाद उपराष्ट्रपति पद को लेकर जो चर्चा शुरू हुई है, वह सिर्फ एक संवैधानिक नियुक्ति नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति का संकेतक बन गई है। चाहे वह हरिवंश की नियुक्ति के जरिए बिहार में पैठ बनाने की कोशिश हो, या राजनाथ सिंह को सम्मानजनक विदाई देना — भाजपा की रणनीति में हर कदम सत्ता संतुलन के लिहाज से सोचा-समझा जा रहा है। अब देखना है कि संसद में सियासत का यह नया अध्याय किस नाम पर जाकर रुकता है।
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