Anurag Thakur Hanuman Remark : अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर भाजपा नेता और हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर ने एक ऐसा बयान दिया जिसने देशभर में चर्चा छेड़ दी है। पीएम श्री स्कूल की एक सभा में छात्रों से संवाद करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि दुनिया के पहले अंतरिक्ष यात्री हनुमानजी थे।” इस टिप्पणी ने वैज्ञानिक समुदाय, शिक्षा विशेषज्ञों और सोशल मीडिया यूज़र्स के बीच बहस छेड़ दी है।
सभा में जब अनुराग ठाकुर ने छात्रों से पूछा कि अंतरिक्ष में सबसे पहले कौन गया था, तो कई छात्रों ने “नील आर्मस्ट्रांग” का नाम लिया। जबकि ऐतिहासिक रूप से यह तथ्य स्थापित है कि रूस के यूरी गागरिन 12 अप्रैल 1961 को वोस्तोक 1 अंतरिक्षयान में सवार होकर पहले इंसान बने जिन्होंने पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश किया। भारत की ओर से राकेश शर्मा 1984 में पहले अंतरिक्ष यात्री बने थे।
अनुराग ठाकुर ने छात्रों को समझाते हुए कहा कि हमें “हज़ारों साल पुरानी परंपरा, ज्ञान और संस्कृति” को जानने की जरूरत है। उन्होंने हनुमानजी के ‘आकाश मार्ग’ से लंका जाने की कथा को आधुनिक अंतरिक्ष यात्रा से जोड़ा। उनके अनुसार, जब तक भारतीय छात्र अपनी सांस्कृतिक विरासत को नहीं समझेंगे, वे केवल “अंग्रेजों द्वारा सिखाए गए” इतिहास तक सीमित रहेंगे।
इस बयान पर मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति के गौरव को बढ़ावा देने वाला विचार बताया, जबकि अन्य ने इसे वैज्ञानिक तथ्यों की अवहेलना कहा। सोशल मीडिया पर हैशटैग #HanumanAstronaut ट्रेंड कर रहा है, जहां यूज़र्स मीम्स और टिप्पणियों के ज़रिए अपनी राय रख रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरिक्ष यात्रा को प्रमाणित करने के लिए वैज्ञानिक तकनीक, उपकरण और साक्ष्य की ज़रूरत होती है। हनुमानजी की कथाएं धार्मिक ग्रंथों में वर्णित हैं, परंतु उन्हें ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं माना जा सकता। ऐसे में हनुमानजी को “पहला अंतरिक्ष यात्री” कहना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता।
इसरो (ISRO) ने हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के मॉडल को प्रस्तुत किया है और 2035 तक उसे स्थापित करने की योजना है। भारत का ‘स्पेस ओडिसी मिशन’ 2047 तक कई प्रमुख अंतरिक्ष अभियानों का हिस्सा बनेगा, जिसमें चंद्रयान, गगनयान और अंतरिक्ष स्टेशन प्रमुख हैं।
अनुराग ठाकुर का बयान भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं पर ध्यान केंद्रित करने का एक प्रयास हो सकता है, लेकिन इसे वैज्ञानिक तथ्यों के साथ मिलाना शिक्षा के क्षेत्र में भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि शिक्षा नीति और विज्ञान संचार इन दो ध्रुवों के बीच कैसे संतुलन बनाते हैं।
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